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फिर जुटेंगे कॉकरोच जंतर मंतर पर !

मोहनलाल मोदी​। 
कल तक लोग यह मानकर चल रहे थे कि दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर से आंदोलन पूरी तरह समाप्त हो गया है, लेकिन अब यह आशंका सता रही है कि आंदोलनकारी एक बार फिर वहीं इकट्ठे होकर सरकार पर अनुचित दबाव बना सकते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार सोशल मीडिया पर यह शंका और भ्रम यह कहकर फैलाया जा रहा है, कि आंदोलन समाप्त होते समय सरकार और आंदोलनकारियों के बीच यह तय हुआ था कि छात्रों के खिलाफ कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं होगी और जिनके खिलाफ पहले मामला दर्ज हुआ है, उन्हें विधि-सम्मत प्रक्रिया के तहत निरस्त या समीक्षाधीन किया जाएगा। परंतु, यदि सोशल मीडिया की गतिविधियों और विपक्षी दलों के बयानों पर गौर करें तो स्पष्ट नजर आता है कि पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर उपद्रव मचाने वाले आपराधिक तत्वों की जांच-पड़ताल शुरू करते ही राजनीति का एक नया दौर शुरू हो गया है। जिन लोगों ने पुलिस बलों पर जानलेवा हमले किए, सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील और अभद्र भाषा का प्रयोग किया, देश के संवैधानिक पदों पर आसीन अति-विशिष्ट जन प्रतिनिधियों का घोर अपमान किया और यहां तक कि मीडिया कर्मियों पर भी कायरतापूर्ण हमले किए, उनकी शिनाख्त करके जब पुलिस उन्हें उनके ठिकानों से उठा रही है, तब विपक्षी दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए यह झूठा आरोप लगाने में जुट गए हैं कि सरकार अपने वादे से मुकर रही है।
​सोशल मीडिया के माध्यम से यह नया शिगूफा छोड़ा जा रहा है कि यदि इसी प्रकार छात्रों की धरपकड़ बनी रही, तो आंदोलनकारी फिर से दिल्ली का रुख कर सकते हैं। लेकिन यहां निष्पक्षता से यह सवाल उठाया जाना आवश्यक है कि आखिर सरकार ने आंदोलनकारियों से वास्तव में क्या वादा किया था? 
यहां बता दें कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच जो औपचारिक समझौता हुआ था, उसकी स्पष्ट शब्दावली पर गौर करने के बाद यह निर्विवाद तथ्य सामने आता है कि केवल उन वास्तविक छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने पर सहमति बनी थी जो विधि-सम्मत तरीके से और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर विभिन्न प्रांतों की पुलिस लोगों की धरपकड़ क्यों कर रही है? इस सवाल का जवाब यह है कि पुलिस और प्रशासन के बेहद विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों, सुरक्षा बलों के शरीर पर लगे बॉडी-वॉर्न कैमरों और मीडिया कवरेज के वीडियो फुटेज के आधार पर गहन वैज्ञानिक अन्वेषण किया जा रहा है। इस अन्वेषण का एकमात्र उद्देश्य उन असामाजिक और उपद्रवी तत्वों की पहचान करना है जिन्होंने वास्तविक छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन में सुनियोजित तरीके से घुसपैठ बनाई और पूरे माहौल में अराजकता उत्पन्न करने का कुत्सित प्रयास किया।
​इन उपद्रवियों के कारण ही पुलिस और मीडिया कर्मियों पर पथराव जैसी हिंसक घटनाएं हुईं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और बेहद गंदी, भद्दी तथा अश्लील गालियों का खुलेआम प्रयोग किया गया। जो लोग पूरी तरह निर्दोष हैं और केवल अपनी मांगों के लिए वहां मौजूद थे, उन्हें पुलिस प्रशासन द्वारा छुआ तक नहीं जा रहा है और पूरी तरह से मुक्त रखा गया है। पुलिस केवल उन्हीं आरोपियों को गिरफ्तार कर रही है जिनके खिलाफ आपराधिक कृत्यों में शामिल होने के ठोस और सत्यापित साक्ष्य मौजूद हैं। परंतु जैसे ही न्याय प्रक्रिया ने अपना काम करना शुरू किया, वैसे ही विपक्षी दलों और उनके नेताओं के पेट में मरोड़ उठने लगी है। उनकी ओर से तुरंत यह भ्रामक आपत्ति उठाई जाने लगी कि सरकार अपने वादों से पीछे हट रही है। दरअसल, विपक्ष के बीच फैल रही इस अफ़रा-तफ़री के पीछे की मुख्य वजह यह है कि छात्र आंदोलन में बहुत तेजी से और पर्दे के पीछे से राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा था।
​जैसे ही आंदोलन के प्रमुख चेहरों ने अपना अनशन तोड़ा और आंदोलन समाप्ति की ओर बढ़ा, विपक्षी नेताओं को यह डर सताने लगा कि उनकी राजनीतिक साजिशों की कहानी कहीं अधूरी न रह जाए। इसी आशंका और बौखलाहट के चलते विपक्षी दालों के अनेक नेताओं ने अपने कृपा पात्र असामाजिक तत्वों को उकसाया और एक सोची-समझी साजिश के तहत उन्हें जंतर-मंतर पर भेजा ताकि वहां कृत्रिम भीड़ जुटाकर सरकार पर भारी मानसिक और नैतिक दबाव बनाया जा सके। यह शंका इसलिए भी पूरी तरह पुष्ट होती है क्योंकि अज्ञात और संदिग्ध स्रोतों द्वारा जंतर-मंतर पर उपद्रव कर रहे लोगों को बेहद महंगी कीमत वाला भोजन, नाश्ता, ताजे फल और मिठाइयां बिल्कुल मुफ्त में बहुतायत से उपलब्ध कराई जा रही थीं। इस प्रकार का प्रलोभन और आकर्षण पैदा करके उपद्रवी तत्वों को जानबूझकर जंतर-मंतर की ओर खींचा गया ताकि व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त किया जा सके।
​वरिष्ठ पत्रकारों और खुफिया तंत्र से मिले संकेतों के अनुसार, पुलिस के मुखबिर तंत्र को यह सनसनीखेज खबर भी मिली थी कि इस पूरे षड्यंत्र के तहत पुलिस प्रशासन को किसी भी तरह उकसाकर गोलीबारी (फायरिंग) कराने की साजिश रची जा रही थी। साजिशकर्ताओं की मंशा यह थी कि जैसे ही पुलिस की ओर से कोई हिंसक प्रतिक्रिया या गोली चालन हो, वैसे ही दिल्ली की ईंट से ईंट बजा दी जाए और माहौल को देशव्यापी दंगे में बदल दिया जाए। यदि गोलीबारी में किसी निर्दोष छात्र की दुखद मृत्यु हो जाती, तो पूरे देश में अराजकता का ऐसा नंगा नाच खड़ा किया जाता जिसकी आड़ में विपक्षी दल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाश सकते। इतना ही नहीं, यह भी आशंका जताई जा रही है कि यदि गोली चालन की साजिश नाकाम हो जाती, तो किसी छात्र द्वारा आत्मदाह जैसा आत्मघाती कदम उठाए जाने की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही थी ताकि देश के युवा वर्ग में गुस्सा पैदा करके बांग्लादेश और नेपाल की तर्ज पर भारत में भी तख्ता पलट कराया जा सके।
​यह केंद्र सरकार की अभूतपूर्व दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और परिपक्वता ही थी कि उसने भावी खतरे और निर्दोष छात्रों की सुरक्षा को भांपते हुए बिना किसी झूठे अहम् के, अत्यंत त्वरित गति से छात्रों की सभी न्यायसंगत मांगों को स्वीकार कर लिया और बेहद कम समय में आंदोलन को शांतिपूर्वक समाप्त कराने में ऐतिहासिक सफलता पाई। सरकार का यह कदम उसकी ईमानदारी और जन-कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। परंतु, देश में कायम हुई यही शांति अब विपक्षी दलों को सबसे ज्यादा खटक रही है। विपक्ष की यह छटपटाहट केवल इस बात से नहीं है कि आंदोलन समाप्त हो गया, बल्कि उनका असली डर यह है कि यदि पकड़े गए उपद्रवी और अराजक तत्वों से पुलिस ने अपने पेशेवर और कड़े तरीके से पूछताछ की, तो ये अपराधी अपने असली आकाओं और राजनीतिक प्रायोजकों के नाम पुलिस के सामने उगल सकते हैं।
​यही वह खौफ है जो आज विपक्षी नेताओं की नींद उड़ाए हुए है। वे यह भली-भांति जानते हैं कि यदि जांच आगे बढ़ी, तो नकाबपोश षड्यंत्रकारियों के चेहरे बेनकाब हो जाएंगे। इसी डर से बचने के लिए वे जनता के बीच यह सफेद झूठ और भ्रम फैला रहे हैं कि पुलिस और सरकार आंदोलनकारियों से बदला ले रही है। इस प्रकार की अनर्गल बयानबाजी और झूठी अफवाहें फैलाकर एक बार फिर जंतर-मंतर पर भारी बवाल खड़ा करने और देश के शांत माहौल को जहरीला बनाने की गहरी साजिश रची जा रही है। ऐसे समय में जब सरकार कानून का शासन बनाए रखने और निर्दोषों की रक्षा करते हुए अपराधियों को सजा दिलाने के अपने कर्तव्य का पूर्ण ईमानदारी से पालन कर रही है, तब देश की प्रबुद्ध, जागरूक और सज्जन शक्ति को विपक्षी दलों के इन जहरीले राजनीतिक षड्यंत्रों से अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है ताकि देश की शांति, सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादा अक्षुण्ण बनी रहे।
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