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चोरों की संरक्षक विद्युत वितरण कंपनियां। ईमानदार उपभोक्ता इनके सॉफ्ट टारगेट

मोहनलाल मोदी।
विद्युत वितरण प्रणाली में सुधार, आधुनिकीकरण और वित्तीय घाटे को कम करने के नाम पर जब-जब नई तकनीकें या नीतियां लागू की जाती हैं, तब-तब उसका पहला और सीधा प्रभाव आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। बिजली उपभोक्ताओं के घरों में स्मार्ट मीटर लगाने का अभियान देशव्यापी स्तर पर तेज़ी से चलाया जा रहा है। इसे उपभोक्ता-अनुकूल और पारदर्शी प्रणाली के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन धरातल पर इसकी वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत नज़र आ रही है। आज आम उपभोक्ता के लिए स्मार्ट मीटर केवल असुविधा, अनिश्चितता और आर्थिक बोझ का पर्याय बन चुके हैं। तकनीक का मूल ध्येय जीवन को सुगम बनाना होता है, परंतु इस पूरी व्यवस्था से ऐसा प्रतीत होता है कि स्मार्ट मीटरों के आगमन से बिजली वितरण कंपनियों का मुनाफा तो सुनिश्चित हुआ है, किंतु उपभोक्ता के हिस्से केवल भ्रम, आर्थिक नुकसान और परेशानी ही आई है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि मीटर बदलते ही अधिकांश परिवारों का मासिक बिजली बिल अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है।
​इस पूरी व्यवस्था का सबसे दुखद पहलू वह भ्रमजाल है जिसे 'तकनीकी पारदर्शिता' के नाम पर बिलों में परोसा जाता है। जब एक साधारण उपभोक्ता अपने बिजली के बिल को ध्यान से देखता है, तो उसे अपनी वास्तविक बिजली खपत और अंतिम देय राशि के बीच एक बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी उपभोक्ता ने एक महीने में 142 यूनिट बिजली की खपत की है, तो उसका मूल 'एनर्जी चार्ज' लगभग 755 रुपये बनता है। एक सामान्य और व्यावहारिक गणित के अनुसार उपभोक्ता को इस खपत के बदले इसी राशि का भुगतान करना चाहिए। किंतु, जब अंतिम बिल हाथ में आता है, तो वह लगभग 986 रुपये का हो चुका होता है। मूल खपत और अंतिम बिल के बीच का यह लगभग 231 रुपये का अंतर किसी रहस्यमयी बाजीगरी से कम नहीं लगता। बिल के पन्नों पर अंकित विविध मदें—जैसे फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज, फिक्स चार्ज और इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी—आम नागरिक की समझ से पूरी तरह परे हैं।
​भारतीय व्यापारिक और सामाजिक व्यवहारिकता का एक बहुत ही सहज नियम रहा है कि उपभोक्ता जिस वस्तु या सेवा का जितना उपयोग करता है, वह उसी की निर्धारित दर के अनुसार मूल्य चुकाता है। एक आम नागरिक को इस बात से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए कि बिजली कंपनी ने ईंधन खरीदने में कितना अतिरिक्त खर्च किया या पावर परचेज एग्रीमेंट में उसे कितना उतार-चढ़ाव देखना पड़ा। फिक्स चार्ज के नाम पर ली जाने वाली अतिरिक्त राशि और अलग से वसूली जाने वाली इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी उपभोक्ता के दृष्टिकोण से एक प्रत्यक्ष अतिरिक्त बोझ ही है। यदि बिजली वितरण कंपनियों की वास्तविक लागत अधिक है और उन्हें प्रति यूनिट अधिक मूल्य की आवश्यकता है, तो उन्हें ग्रॉस रेट यानी कुल मिलाकर प्रति यूनिट की दर को ही स्पष्ट रूप से बढ़ा देना चाहिए। इस प्रकार अलग-अलग मदों में जोड़-तोड़ करके अंतिम राशि को भारी-भरकम बना देना और फिर वैश्विक मंचों पर यह दावा करना कि बिजली सस्ती दी जा रही है, उपभोक्ताओं को एक प्रकार से भ्रमित करने की ही नीति है।
​यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न विद्युत नियामक आयोगों की कार्यप्रणाली पर उठता है। नियामक निकायों की स्थापना का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना और वितरण कंपनियों की एकाधिकारवादी मनोवृत्ति पर अंकुश लगाना था। परंतु, वर्तमान परिदृश्य में ऐसा लगता है कि ये आयोग केवल कंपनियों के राजस्व घाटे की भरपाई के साधन बनकर रह गए हैं। नियामक आयोग को यह स्पष्ट निर्देश देना चाहिए कि बिजली की दरों को पूर्णतः पारदर्शी और एकीकृत बनाया जाए, ताकि बिल देखते ही उपभोक्ता को यह समझ आ जाए कि उसने किस भाव से बिजली खरीदी है। वर्तमान में स्थिति यह है कि यदि आम उपभोक्ता से अनजाने में खपत थोड़ी बढ़ जाए या आर्थिक तंगी के कारण बिल जमा करने में कुछ दिनों की देरी हो जाए, तो उस पर भारी-भरकम पेनल्टी और लेट फीस थोप दी जाती है। यहाँ तक कि बिना किसी पूर्व सहानुभूति के कनेक्शन काटने की धमकियां दी जाती हैं और कनेक्शन काट भी दिए जाते हैं। बिजली कंपनियों का यह कठोर रवैया तब और अधिक अखरता है जब हम स्वयं बिजली विभाग की आंतरिक कमियों पर दृष्टि डालते हैं।
​बिजली तंत्र का सबसे बड़ा और पुराना नासूर 'लाइन लॉस' यानी ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन का नुकसान है। सार्वजनिक रूप से यह तर्क दिया जाता है कि लाइन लॉस के कारण दरों में वृद्धि अनिवार्य है, लेकिन इस नुकसान के पीछे का कड़वा सच किसी से छिपा नहीं है। लाइन लॉस का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधी बिजली चोरी, कमजोर बुनियादी ढांचे और विभागीय कर्मचारियों तथा अधिकारियों की ढिलाई या मिलीभगत का परिणाम है। जब बिजली की चोरी कंपनी के अपने कर्मचारियों की लापरवाही या भ्रष्ट आचरण के कारण हो रही है, तो उसकी सजा ईमानदारी से बिल भरने वाले आम नागरिकों को क्यों दी जानी चाहिए? नियामक आयोग हर साल लाइन लॉस की भरपाई के नाम पर प्रति यूनिट दरें बढ़ा देता है। 
इसका सीधा परिणाम यह होता है कि आम उपभोक्ता महंगाई की मार से पिसता रहता है, जबकि भ्रष्टाचार में लिप्त या अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह अधिकारियों पर कोई आंच नहीं आती। यह एक बेहद गंभीर स्थिति है जिसकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होनी अत्यंत आवश्यक है।

वीडियो के माध्यम से समझने के लिए यहां क्लिक करें -
महंगी बिजली के बिलों में 
घपलेबाजी का बड़ा खुलासा 
https://youtu.be/Am7OZKk33do?si=tcniFGq8KFhSC62L

​सरकार और नीति निर्धारकों को भी इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक राजस्व व्यवस्था के रूप में देखने के बजाय सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से देखना होगा। यदि सरकार वास्तव में बिजली क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार चाहती है, तो उसे अपना ध्यान ईमानदार ग्राहकों को दंडित करने के बजाय बिजली चोरी के खिलाफ कठोरतम कदम उठाने पर केंद्रित करना चाहिए। जब तक भ्रष्ट कर्मचारियों और कामचोर तत्वों पर शिकंजा नहीं कसा जाएगा और बिजली चोरी की शत-प्रतिशत वसूली इन्हीं जिम्मेदार लोगों से नहीं की जाएगी, तब तक कोई भी नया मीटर या नई व्यवस्था सफल नहीं हो सकती। यदि बिजली चोरी को सख्ती से रोका जाए और विभागीय जवाबदेही तय की जाए, तो बिजली कंपनियों का घाटा स्वतः समाप्त हो जाएगा। इससे न केवल सरकारी खजाने पर सब्सिडी का भारी बोझ कम होगा, बल्कि देश के करोड़ों आम बिजली उपभोक्ताओं को भी बिजली बिलों के इस अप्रत्यक्ष भ्रमजाल से एक वास्तविक और स्थायी राहत मिल सकेगी।
लेखक विषय वस्तु लेखक हैं और अनेक नाम चीन साहित्यकारों के लेखन कार्य में सहयोगात्मक भूमिका निभा रहे हैं।
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