छात्र तो नीट की पुनर्परीक्षा में ताल्लीन थे।
फिर जंतर मंतर पर उपद्रव मचाने वाले तत्व कौन?
ढेरों ईंटों, पत्थरों की उपलब्धता के स्रोत कहां?
मां बहन की गंदी गालियां बकने वाले क्या छात्र थे?
उपद्रवियों के हाथों में धारदार तलवारें कहां से आईं?
भारत को बांग्लादेश नेपाल बनाने की साजिश किसकी?
सड़कों पर उत्पात लेकिन संसद से बहिर्गमन क्यों?
छात्र आंदोलनों का भारतीय लोकतंत्र में एक लंबा इतिहास रहा है। वह छात्र आंदोलन की ही ताकत थी, जिसने कांग्रेस द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल के खिलाफ चारों दिशाओं में विरोध की एक प्रचंड लहर पैदा की थी और उसे हिटलर शाही सरकार के खिलाफ लोकतांत्रिक संघर्ष बना दिया था। जबकि पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक कहीं पर भी संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ अश्लील शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ। आंदोलनकारियों की ओर से पथराव तो दूर, कहीं से भी एक कंकड़ तक सत्ता पक्ष और उसके द्वारा चाक चौबंद किए गए सुरक्षा बलों की ओर नहीं उछाला गया।
लेकिन जब दिल्ली के जंतर मंतर पर पवित्र छात्र आंदोलन की आड़ लेकर देश में अराजकता, हिंसा और राजनीतिक तख्तापलट जैसी स्थितियां पैदा करने की कोशिश की गई, तो यह विषय गंभीर चिंता का बन जाता है। हालिया घटनाक्रम को देखें तो केंद्र सरकार ने न केवल छात्रों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए अभूतपूर्व संवेदनशीलता और तत्परता दिखाई, बल्कि विवाद की हर एक जड़ को क्रमशः समूल नष्ट कर दिया। नीट परीक्षा में गड़बड़ी के आरोप सामने आते ही सरकार ने उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए, दोषी अधिकारियों को बर्खास्त किया गया और पूरे मामले को तेजी से सुलझाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की घोषणा की। इतना ही नहीं, आंदोलन से उपजे असंतोष को शांत करने के लिए सरकार ने छात्र नेताओं की सभी जायज मांगों को स्वीकार किया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होना और सोनम वांगचुक द्वारा अनशन समाप्त किया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सरकार किसी भी मुद्दे पर गतिरोध बनाए रखने के पक्ष में नहीं थी। दुखद परिस्थितियों में अपनी जान गंवाने वाले विद्यार्थियों के परिवारों को अधिकतम मुआवजा देने की दिशा में विचार शुरू करना और आंदोलनकारी छात्रों पर कोई कानूनी कार्रवाई या प्राथमिकी दर्ज न होने देने का निर्णय यह दर्शाता है कि सरकार का रुख अभिभावक की भांति सहानुभूतिपूर्ण और सकारात्मक रहा।
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यह करते हैं राष्ट्रहित के मुद्दों पर भी राजनीति
परंतु, इस पूरे परिदृश्य का सबसे चिंताजनक और दुखद पहलू यह है कि जब झगड़े की अधिकांश मुख्य वजहें समाप्त हो चुकी थीं और असली छात्र नीट की पुनर्परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त थे, तब दिल्ली के जंतर-मंतर पर यह विद्रूप खेल किनके द्वारा और किन लोगों के इशारे पर खेला जा रहा था। छात्र हित के नाम पर जंतर-मंतर को जिस प्रकार अश्लीलता, अराजकता और राजनीतिक गुंडागर्दी का अखाड़ा बनाया गया, उसने लोकतंत्र के माथे पर कलंक लगाने का काम किया है। वहां देश के संवैधानिक प्रमुखों और प्रधानमंत्री के खिलाफ जिस प्रकार की अश्लील और अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया, उसकी कोई भी सभ्य समाज अनुमति नहीं दे सकता। अति-विशिष्ट व्यक्तियों के सांकेतिक चित्रों के साथ किए गए भौड़े प्रदर्शन, मीडिया कर्मियों को घेरकर डराने-धमकाने के प्रयास और उन पर की गई अभद्र टिप्पणियां यह साबित करती हैं कि जंतर-मंतर पर मौजूद भीड़ पूरी तरह से भविष्य का निर्माण करने वाले विद्यार्थियों की तो नहीं थी। पुलिस बल पर पथराव, लाठी-डंडों से हमले और खुलेआम तलवारें लहराते उपद्रवी इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यह आंदोलन छात्रों के हाथ से निकलकर उन राजनीतिक संरक्षण प्राप्त असामाजिक तत्वों के नियंत्रण में चला गया था जो देश में अस्थिरता फैलाना चाहते थे।
इस पूरे घटनाक्रम में विपक्षी दलों की भूमिका अत्यंत संदिग्ध और गैर-जिम्मेदाराना रही। विपक्ष ने छात्रों के आंदोलन को अपना समर्थन तो दिया, जिससे किसी को ऐतराज नहीं। लेकिन जब जंतर-मंतर पर हिंसा, उपद्रव, पथराव हो रहे थे और कानून-व्यवस्था को खुलेआम चुनौती दी जा रही थी, तब एक भी विपक्षी नेता ने आगे आकर इस हिंसा की स्पष्ट शब्दों में निंदा नहीं की। मौन रहकर उपद्रव का समर्थन करना वास्तव में ऐसी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को अपरोक्ष रूप से प्रोत्साहित करने के समान ही है। विपक्षी नेताओं की इस मंशा के पीछे का षड्यंत्र तब और साफ हो जाता है जब हम वैश्विक परिदृश्य को देखते हैं। बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में हुए तख्तापलट और राजनीतिक उथल-पुथल को कुछ विपक्षी नेता भारत में अपने लिए 'आपदा में अवसर' के रूप में देख रहे हैं। उनकी मंशा छात्र असंतोष की आड़ में भारत के भीतर भी वैसी ही अराजकता और अस्थिरता का माहौल तैयार करने की थी।
यही कारण है कि उन चेहरों की पहचान किया जाना अत्यंत आवश्यक है जो निर्दोष छात्रों के कंधों पर बंदूक रखकर अपने राजनीतिक हित साध रहे थे। यह एक बड़ा जांच का विषय है कि जब वास्तविक नीट अभ्यर्थी अपनी पढ़ाई और परीक्षाओं में मशगूल थे, तब सड़कों पर उतरकर तोड़फोड़ और उपद्रव करने वाले ये नकाबपोश लोग आखिरकार कौन थे। इतना ही नहीं, जंतर-मंतर पर डटे इन उपद्रवियों के लिए विदेशी फंडिंग और गुप्त तरीकों से जोमैटो आदि के माध्यम से भोजन और रसद सप्लाई करने के पीछे कौन सा सिंडिकेट काम कर रहा था, इसका पर्दाफाश होना देश की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। राजनीतिक अवसरवादिता का आलम यह था कि सोनम वांगचुक के अनशन के दौरान कोई भी बड़ा विपक्षी नेता उनके साथ मंच साझा करने या अनशन पर बैठने का साहस नहीं दिखा सका, लेकिन जैसे ही उन्हें स्वास्थ्य कारणों से हटाया गया, पूरे मैदान पर गंदी राजनीति हावी हो गई। प्रधानमंत्री आवास का घेराव कर सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने के जो प्रयास हुए, वे सीधे तौर पर देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसे थे।
ऐसे षड्यंत्रकारी नेताओं और उनके द्वारा पोषित गुंडों को कानून के दायरे में लाकर उनके सही अंजाम तक पहुंचाया जाना समय की मांग है। संसद के भीतर सार्थक चर्चा और बहस से भागने वाले इन नेताओं ने सड़कों पर अराजकता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकार ने अपनी ओर से अधिकतम नम्रता, तत्परता और संवेदनशीलता दिखाकर यह साबित कर दिया है कि वह छात्रों के भविष्य के प्रति पूरी तरह गंभीर है। अब समय आ गया है कि जांच एजेंसियां इस पूरे षड्यंत्र की गहराई से जांच करें और उन नकाबपोश चेहरों को बेनकाब करें जो छात्र आंदोलन की आड़ में देश को गृहयुद्ध और अराजकता की आग में झोंकना चाहते थे, ताकि भविष्य में कोई भी राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए देश की शांति और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न कर सके।
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