भोपाल। राजनीतिक संरक्षण के चलते शासकीय आवासों पर कब्जे कैसे होते हैं। इन्हें खाली कराने के नाम पर अधिकारियों को कैसे पसीना आता है। सरकारी विभागों में जन सेवा और जन सुविधाओं के नाम पर कैसी भर्राशाही कायम है। इन सब की नजीर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अयोध्या नगर और ऐशबाग में देखी जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि नगर निगम भोपाल ऐशबाग के 600 जनता क्वार्टर्स और अयोध्या नगर एच सेक्टर के 258 ईडब्ल्यूएस आवासों को अति जर्जर तथा रहने के लिए अयोग्य घोषित कर चुका है। मतलब साफ है, ये सभी आवास कभी भी धराशाई हो सकते हैं और भारी पैमाने पर जन हानि की आशंका उपस्थित है। जाहिर है जब तोड़फोड़ शुरू होगी तब आवासों के वर्तमान कब्जाधारी नए बनाए जाने वाले भवनों में अपना आवास सुरक्षित करना चाहेंगे। यानि तोड़फोड़ से पहले वादा करो - नए निर्माण में वर्तमान कब्जाधारियों को स्वामित्व की हैसियत से आवास दिए जाएंगे। क्योंकि दोनों ही जगहों पर निर्माण एजेंसी हाउसिंग बोर्ड है। वह सभी लगभग 858 वर्तमान कब्जाधारियों को इस आशय का कमिटमेंट करने में खुद को अक्षम पा रहा है। क्योंकि बमुश्किल लगभग एक सैकड़ा लोग ऐसे हैं जिनके पास मकान की रजिस्ट्री है। बाकी कह रहे हैं हमें अथवा हमारे खरीददार पूर्वजों को रजिस्ट्री मिली ही नहीं। यदि इस दावे को सही मान भी लें तो हाउसिंग बोर्ड बगैर वैधानिक दस्तावेजों के बाकी लोगों को नए भवनों का स्वामित्व दे भी तो कैसे ?
लेकिन यह हालात बने क्यों, इस बारे में क्षेत्रीय निवासियों का कहना है कि हाउसिंग बोर्ड द्वारा बनाए गए अनेक आवास लंबे अर्से तक खाली पड़े रहे। इन्हें बेचने के अनेक प्रयास हुए, लेकिन घटिया निर्माण के चलते लोगों ने अपने खून पसीने की कमाई को इनमें निवेश करना उचित नहीं समझा। नतीजा यह हुआ कि राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त मौका परस्त लोग इन आवासों में काबिज होते चले गए। आवास जर्जर हैं, कभी भी भरभरा कर गिर सकते हैं। यह जानकार भी लोग इन्हें खाली नहीं कर रहे। क्योंकि ये भलीभांति जानते हैं, एक बार बाहर हुए तो दोबारा मकान मिलन मुश्किल है। जानकार बताते हैं कि अवैध कब्जाधारियों को राजनीतिक रसूखदारों का संरक्षण प्राप्त है। उन्हीं की शह पर हाउसिंग बोर्ड और नगर निगम को आंखें दिखाई जा रही हैं। दबाव डाला जा रहा है कि वे जर्जर निर्माण तोड़ने से पहले वादा करें कि जब नए भवन बनेंगे तो उनमें इन सबको मालिक की हैसियत से मकान दिए जाएंगे, वरना आंदोलन होगा। शायद यही वजह है कि तोड़क एजेंसी को पुलिस प्रोटेक्शन का इंतजार है। यहां के अधिकारी कह रहे हैं पुलिस बल प्राप्त होते ही तोड़फोड़ शुरू कर देंगे। अब देखना दिलचस्प होगा कि हाउसिंग बोर्ड वैध और अवैध कब्जों में फर्क कर पाता है अथवा राजनीतिक षडयंत्रों के चलते अवैध कब्जेधारियों के सामने घुटने टेकने की मजबूरी कायम होती है। एक जागरूक पत्रकार होने के नाते बता दें, कोई कुछ भी कहे, हाउसिंग बोर्ड में यह रिकॉर्ड आवश्यक मौजूद होना चाहिए कि विभाग ने कब कौन सा आवास किस व्यक्ति को विक्रित किया था। बिक्री के एवज में प्राप्त धनराशि की आवक जावक भी रिकॉर्ड में प्रदर्शित होगी ही होगी। लेकिन यह सच्चाई जानने की जहमत तभी उठाई जाएगी जब हाउसिंग बोर्ड का अमला किसी भी राजनीतिक रसूख से निष्प्रभावी रह पाएगा।
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