उपद्रवियों को बचाने का संयुक्त आंदोलन क्यों
विपक्षी षड्यंत्रकारियों का बड़ा खुलासा
संसद और सड़क पर जारी सियासी षड्यंत्रों पर
मोहनलाल मोदी की विस्तृत रिपोर्ट
लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने का अधिकार संविधान ने हर नागरिक को दिया है, लेकिन जब विरोध की आड़ में राष्ट्र की मर्यादा, सामाजिक ताने-बाने और कानून-व्यवस्था को तार-तार किया जाने लगे, तो उसे आंदोलन नहीं बल्कि सीधी-साधी अराजकता और हिंसा कहा जाता है। दिल्ली के जंतर मंतर पर घटित घटनाक्रमों ने एक बार फिर देश के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या छात्र आंदोलन के नाम पर हिंसा, तोड़फोड़, अश्लीलता, गाली-गलौज और पुलिस बल पर पथराव करने वाले उपद्रवियों को संरक्षण दिया जाना चाहिए? जब सरकार और प्रशासन ऐसे असामाजिक तत्वों पर शिकंजा कसते हैं, तो विपक्षी दलों का आग बबूला होना और पुनः जंतर-मंतर पर बवंडर मचाने की धमकियां देना उनकी राजनीतिक शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह बात सर्वविदित है कि सरकार ने शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों की मांगों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है और उन पर मुकदमे दर्ज न करने का आश्वासन भी दिया है, लेकिन आंदोलनकारी और उपद्रवियों के बीच के बुनियादी अंतर को समझना बेहद आवश्यक है। उपद्रवियों को आंदोलनकारियों की श्रेणी में रखकर देखना न केवल देश के वास्तविक छात्रों और नागरिकों का अपमान है, बल्कि यह कानून के शासन को चुनौती देने जैसा है। क्या देश का विपक्ष और स्वघोषित छात्र हितैषी संगठन ऑन रिकॉर्ड यह स्वीकार करने का साहस दिखा सकते हैं कि जो लोग देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे प्रधानमंत्री की मां-बहन को अभद्र गालियां दे रहे थे, सरेआम अश्लील हरकतें कर रहे थे और अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे मीडियाकर्मियों पर कायराना हमले कर रहे थे, क्या वे वास्तव में छात्र या आंदोलनकारी थे? विपक्षी नेताओं की यह मजबूरी समझ से परे है कि वे छात्र हित के नाम पर केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए इन उपद्रवियों की ढाल बन रहे हैं। विपक्ष को यह साफ-साफ स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे देश में अराजकता, हिंसा और गुंडागर्दी फैलाने वाले अपराधियों की गिरफ्तारी के भी खिलाफ हैं? आज का दौर डिजिटल युग का है, जहां हर हाथ में मोबाइल है और हर गतिविधि कैमरे में कैद हो रही है। सोशल मीडिया और रील के इस जमाने में सच किसी से छिपा नहीं है। जनता स्पष्ट रूप से देख सकती है कि कौन अपनी मांगों को गरिमापूर्ण तरीके से रख रहा था और कौन अपनी निकृष्ट हरकतों से अपने माता-पिता और समाज को शर्मिंदा कर रहा था। जरा सोचिए, उन अभिभावकों के दिल पर क्या बीत रही होगी, जब वे अपने बेटे-बेटियों के बेहद आपत्तिजनक, अश्लील और हिंसक वीडियो सोशल मीडिया पर तैरते हुए देख रहे हैं।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन्हें ज्ञान और संस्कार अर्जित करने भेजा गया था, वे छात्र आंदोलन में उपद्रव फैलाने निकल पड़े। मैं तो कहता हूं कि ऐसे तत्वों के वीडियो चिन्हित करके उनके परिजनों और रिश्तेदारों तक पहुंचाए जाने चाहिए। ताकि समाज को भी पता चले कि छात्रवेश में छिपे ये लोग किस तरह अपने कुल और समाज के मुख पर कालिक पोत रहे हैं। जांच एजेंसियों, विभिन्न सीसीटीवी कैमरों, बॉडी वार्म कैमरों, मीडिया फुटेज और निजी मोबाइलों से प्राप्त रिकॉर्डिंग ने इस पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया है। सरकार को मिले हजारों घंटों के फुटेज में साफ दिख रहा है कि असामाजिक तत्वों द्वारा किस प्रकार संगठित होकर तोड़फोड़ की गई और सुरक्षा बलों पर जानलेवा हमले किए गए। सबसे चौंकाने वाला खुलासा तो यह हुआ है कि इनमें से अधिकांश उपद्रवी कोई सीधे-साधे छात्र नहीं, बल्कि पहले से ही बेहद खतरनाक और गंभीर आपराधिक मामलों में संलिप्त पेशेवर अपराधी हैं। इन पेशेवर मुजरिमों ने छात्रों का मुखौटा पहनकर विरोध प्रदर्शन की आड़ ली ताकि वे पदलोलुप नेताओं के छुपे हुए नापाक एजेंडे को अंजाम दे सकें। बेहद शर्म की बात यह है कि विपक्ष ऐसे असामाजिक और देशद्रोही तत्वों को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है और पुनः देश की राजधानी को बंधक बनाने की धमकियां दे रहा है। जाने-अनजाने में कुछ वर्ग भी इन उपद्रवियों को वैचारिक और नैतिक सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे हैं, जो अंततः देश के भविष्य के लिए बेहद घातक साबित होने वाला है। सरकार का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे और हर नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करे। जब सरकार कड़े कदम उठाकर ऐसे उपद्रवियों को सलाखों के पीछे भेज रही है, तो यह किसी राजनीति से प्रेरित कर्रवाई नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और कानून का शासन कायम करने के लिए उठाया गया अति-आवश्यक कदम है। विपक्षी दलों को देश विरोधी और समाज विरोधी तत्वों की वकालत छोड़कर राष्ट्र निर्माण और शांति व्यवस्था में अपना योगदान देना चाहिए, क्योंकि अपराधियों को संरक्षण देकर राजनीतिक लाभ पाने की विपक्षी कोशिशें देश की एकता और अखंडता के लिए एक बड़ा खतरा है।
लेखक प्रिंट इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया में निरंतर लेख लिखते रहते हैं। देश और प्रदेश के अनेक नामचीन साहित्यकारों के साहित्यिक सृजन में आपका मूलभूत योगदान बना हआ है।
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