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उपचुनावी पराजय के मूल में आत्मविश्वास की अति

मोहनलाल मोदी। 
​हाल ही में गुजरात, मध्य प्रदेश और बिहार की तीन विधानसभा सीटों पर संपन्न हुए उपचुनावों के परिणाम केवल चुनावी जय-पराजय का सांख्यिकी आंकड़ा भर नहीं हैं, बल्कि ये सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व, उसकी  टिकट-वितरण रणनीति और सहयोगियों के साथ उसके शक्ति-संतुलन के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी हैं।
​यदि इन परिणामों का निष्पक्ष और तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ केवल गुजरात की मांजलपुर सीट जीतकर भाजपा अपनी साख बचा पाई, वहीं मध्य प्रदेश की दतिया और बिहार की बांकीपुर—दोनों ही अपने गढ़ मानी जाने वाली अत्यंत हाई-प्रोफाइल सीटों पर पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है।
​मध्य प्रदेश की ​दतिया सीट पर मिली हार की समीक्षा करें तो वहां भाजपा की आंतरिक खींचतान, प्रादेशिक स्तर के असंतोष और केंद्रीय आलाकमान की अति-आत्मविश्वासी शैली स्पष्ट नजर आती है। यह किसी से छुपा नहीं है कि दतिया सीट पर वर्षों से कद्दावर नेता और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की मजबूत पकड़ रही है। 2023 के विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के राजेंद्र भारती से महज कुछ हजार वोटों के अंतर से हारे थे। बाद में कानूनी व तकनीकी कारणों से जब यह सीट रिक्त हुई, तो क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे नरोत्तम मिश्रा को भाजपाई मैंडेट का स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था। वहीं मध्य प्रदेश संगठन ने केंद्रीय आलाकमान को नरोत्तम मिश्रा का सिंगल नाम भेजा था। इसके बावजूद, पार्टी की 'चौंकाने वाले चेहरे' उतारने की प्रवृत्ति के तहत अंतिम क्षणों में मिश्रा का टिकट काटकर एकदम नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैंडेट सौंप दिया गया।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि नरोत्तम मिश्रा को विश्वास में लिए बिना नए प्रत्याशी को मैंडेट देने का सीधा प्रभाव नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों और पारंपरिक कैडर के मनोबल पर पड़ा। नतीजतन, कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को तब हरा दिया जबकि उनके खेमे में भी गुटबाजी चरमोत्कर्ष पर देखी जा रही थी। यह हार दरअसल विरोधी दल की अप्रत्याशित लहर से अधिक, भाजपा के अपने आंतरिक असंतोष, उपेक्षा और मतदाताओं द्वारा एक कद्दावर नेता के साथ हुए व्यवहार के खिलाफ दिए गए जनादेश का परिणाम भी थी। 
 अब ​बिहार की बांकीपुर सीट पर गौर करते हैं। वहां मिली हार भाजपा के लिए मध्य प्रदेश से भी अधिक गंभीर और कड़वा झटका है। दरअसल यह सीट पिछले 30 वर्षों से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और उनके परिवार का अभेद्य किला रही है। यह सीट इसलिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि बाकीपुर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा में जाने के कारण खाली हुई थी। ​अंतिम समय में फेरबदल की भारी भूल ने भी यहां भाजपा की हार सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। इस सीट पर अभिषेक कुमार ('बंटी') का नाम लगभग तय था और वह भाजपा उम्मीदवार की हैसियत से अपना नाम निर्देशन पत्र भी दाखिल कर चुके थे। लेकिन अंतिम क्षणों में सत्ता-संगठन के शीर्ष स्तर पर हुए नाटकीय हस्तक्षेप के बाद नीरज कुमार सिन्हा का नाम सामने लाया गया। बांकीपुर में भाजपा का यह 'ओवर कॉन्फिडेंस' और मुख्य घटक दल जदयू से बेहतर समन्वय का अभाव उस पर भारी पड़ गया। इसका सीधा फायदा जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को मिला, जिन्होंने नीरज कुमार को भारी मतों से हराकर इतिहास रच दिया और भाजपा के सबसे सुरक्षित गढ़ में अपनी पहली ऐतिहासिक चुनावी जीत दर्ज करा दी।  चुनाव परिणामों के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच दिल्ली में हुई त्वरित मुलाकात इस बात की पुष्टि करती है कि बांकीपुर की हार ने एनडीए के शीर्ष नेतृत्व को गठबंधन के आंतरिक तालमेल और घटक दलों के सम्मान को लेकर फिर से रणनीति बनाने का संकेत दिया है। ​उप चुनावों के इन नतीजों के साथ-साथ हालिया दिनों में घटे कुछ अन्य घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि राजनीतिक पटल पर घटने वाली कुछ विशेष घटनाओं को नजरंदाज करना सत्ता के लिए कभी भी भारी पड़ सकता है। उदाहरण के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में छात्रों और युवाओं द्वारा किए गए विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों के दौरान शासन व संगठन स्तर पर जो अनदेखी के आरोप लगे, उसने भी शहरी युवाओं और मध्यम वर्ग के बीच एक नकारात्मक संदेश तो भेजा। इसी दौरान बिहार में भी, जो अफरा तफरी का माहौल रहा, उसे नियंत्रित करने और उसके प्रतिकूल प्रभाव भांपने में भी वहां के सत्ता और संगठन लगभग विफल ही रहे। भोजपुर में भरत तिवारी के पुलिस एनकाउंटर ने भी बाकीपुर उप चुनाव को आंशिक रूप से ही सही, किंतु प्रभावित तो किया।
​इतिहास साक्षी है, एक समय जब कांग्रेस में यह सोच घर कर गई थी कि वह किसी भी 'लैंप-पोस्ट' को खड़ा कर दे तो वह भी जीत ही जाएगा, तब से उसका पतन शुरू हुआ और वह पूरे देश से सिमटती चली गई। वर्तमान भाजपा के भीतर भी नए प्रयोगों और अति-आत्मविश्वास के नाम पर जनसमर्थन को "ग्रैंडेड" लेने का यही नकारात्मक ट्रेंड दिख रहा है, जो चिंता और चिंतन का विषय होना चाहिए। जहांतक ​गुजरात की मांजलपुर सीट पर भाजपा की जीत की बात है तो वह केवल इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री का गृह राज्य होने के कारण वहाँ पार्टी का पारंपरिक कैडर सुरक्षित रहा। परंतु मध्य प्रदेश और बिहार के परिणाम यह स्पष्ट करते हैं कि ​'चौंकाने वाली राजनीति' की ज्यादा व्यापक सीमाएँ सर्वथा सुरक्षित नहीं मानी जा सकतीं।हर चुनाव में क्षेत्रीय नेताओं, जनाधार वाले क्षत्रपों और जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करके केवल 'सरप्राइज फैक्टर' के दम पर सदैव ही चुनाव जीतना संभव नहीं है। चाहे दतिया में क्षेत्रीय नेताओं का अपना व्यक्तिगत दंभ हो या दिल्ली-भोपाल/पटना के आलाकमान का अति-आत्मविश्वास—जनता ने दोनों को ही नकार कर यह संदेश दे दिया है कि लोकतंत्र में मतदाता को अपनी जेब में मान लेना वर्तमान राजनेताओं की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है। बिहार का चुनावी परिणाम यह चेतावनी देता है कि सहयोगियों  को नजरअंदाज करना और नए उभरते विकल्पों को हलके में लेना भाजपा की रणनीति में एक बड़ा छिद्र साबित हो सकता है।  भाजपा को इन उपचुनावों को केवल 'स्थानीय हार' मानकर खारिज करने के बजाय अपनी टिकट-प्रणाली, आंतरिक गुटबाजी, जमीनी कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान और गठबंधन सहयोगियों के प्रति अपनी नीति का गहराई से पुनर्मूल्यांकन करना होगा। अन्यथा, अति-आत्मविश्वास की यह राह आगामी प्रमुख राज्य चुनावों में पार्टी की राह को और भी कठिन बना सकती है।
 अंत में कांग्रेस की बात करें तो उसे सीख देना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। अतः वहां विराजमान स्वयंभू विद्वानों को सलाह देने से सुरक्षात्मक परहेज बरता गया है। वैसे भी विद्वान कह गए हैं -
 ज्ञानी से कहिए कहा, कहत कबीर लजाय।
 अंधे आगे नाच के, कला अकारथ जाय।।
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