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अश्लीलता के लिए याद किया जाएगा जंतर मंतर का NEET आंदोलन

मोहनलाल मोदी।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में नीट पेपर लीक के विरोध के नाम पर जो कुछ भी घटित हुआ, उसने देश के जागरूक और संवेदनशील नागरिकों को  चिंता में डाल दिया है। छात्रों की समस्याओं और मांगों को लेकर पहले भी देश में कई आंदोलन हुए हैं। हालांकि, अतीत के आंदोलनों में हिंसा, अराजकता या आगजनी की घटनाएं भले ही देखने को मिलती रही हों, लेकिन यह शायद पहला ऐसा आंदोलन था जो अपने समापन तक पहुंचते-पहुंचते विरोध के नाम पर अश्लीलता और भाषाई मर्यादा के निकृष्टतम स्तर तक जा गिरा। जिस देश में बड़ों के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति आत्मीय स्नेह और संवाद में शिष्टाचार की एक समृद्ध परंपरा रही है, वहां तथाकथित उच्च शिक्षित छात्र-छात्राओं द्वारा देश के संवैधानिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों, प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री को सार्वजनिक रूप से अश्लील गालियां दी गईं। मर्यादाओं को पूरी तरह ताक पर रखकर फूहड़ता का नंगा नाच सड़कों पर देखने को मिला और अति-विशिष्ट व्यक्तियों के चित्रों के साथ जो अशोभनीय हरकतें की गईं, वह भारतीय जनमानस और सामाजिक मूल्यों के लिए अत्यंत चिंताजनक संकेत है।
​यह पूरी घटना इस बात को रेखांकित करती है कि आजादी के बाद के छह-सात दशकों में जो पाठ्यक्रम तैयार किए गए, उनसे देश को चिकित्सक, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी, व्यवसायी और उद्योगपति तो मिले, लेकिन कहीं न कहीं वे संस्कार और नैतिक मूल्य पीछे छूट गए जो एक व्यक्ति को जिम्मेदार और सुसंस्कृत नागरिक बनाते हैं। हम डिग्रीधारी और शिक्षित तो होते गए, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों और संस्कारों से दूर होते चले गए। इसी विचारहीनता के दुष्परिणाम आज सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं।
​नैतिकता के इसी अधोपतन को रोकने और शिक्षा को भारतीयता व सनातन मूल्यों से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी राष्ट्रवादी संस्थाओं एवं आर्य समाज जैसे संगठनों ने संस्कार, संस्कृति आधारित शिक्षा की मजबूत आधारशिला रखी। संघ से प्रेरित 'सरस्वती शिशु मंदिर' जैसे शैक्षणिक संस्थानों ने विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए भी भावी पीढ़ी में देशप्रेम, अनुशासन, मर्यादा और सनातन परंपराओं के बीज बोने का निरंतर कार्य किया। इसके विपरीत, आजादी के बाद लंबे समय तक सत्ता में रही तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकारों और वामपंथी प्रभाव वाले नीति निर्धारकों ने ऐसी राष्ट्रवादी पहलों को लगातार हतोत्साहित किया।
​दूसरी ओर, उपभोक्तावादी सोच और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में आकर समाज का एक बड़ा तबका भी अपनी संतानों को महज 'पैसा कमाने की मशीन' बनाने की होड़ में शामिल हो गया। कार्ल मार्क्स, लेनिन और पश्चिमी जीवनशैली से प्रभावित शिक्षा मॉडल का प्रभाव इस कदर बढ़ा कि देश में दो अलग-अलग वैचारिक धाराएं स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगीं। एक धारा वह है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय दर्शन से प्रेरित होकर सनातन संस्कृति, सामाजिक मर्यादा और राष्ट्रीय मूल्यों को सर्वोपरि मानती है। वहीं दूसरी धारा वह है जिसे पश्चिमी सभ्यता ही श्रेष्ठ दिखाई देती है, स्वच्छंद यौनाचार जहां सामान्य आचार व्यवहार माना जा चुका है। जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर सामाजिक मर्यादाओं, नैतिक बंधनों और पारिवारिक संस्कारों को दरकिनार करना आधुनिकता मान लिया जाता है। 
​लंबे समय तक भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं को हाशिए पर रखे जाने के बाद, जब केंद्र और विभिन्न राज्यों में भारतीय संस्कृति, संस्कारों को प्राथमिकता देने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकारें आईं, तब युद्ध स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी सुधारों की शुरुआत हो गई। विगत कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा पाठ्यक्रमों में भारतीय इतिहास, सनातन संस्कृति और नैतिक मूल्यों को समावेशित करने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। 7 दशकों के बाद हुए इन पाठ्यक्रम सुधारों ने उन वामपंथी बुद्धिजीवियों, भारत-विरोधी तत्वों में भारी अकुलाहट और आक्रोश पैदा कर दिया है, जिन्हें अक्सर 'अर्बन नक्सल' मानसिकता से ग्रस्त माना जाता है।
​यह वामपंथी और विरोधी तत्व लंबे समय से किसी भी ऐसे अवसर की ताक में थे, जिससे वे केंद्र की भाजपा सरकार और उसकी राष्ट्रवादी नीतियों को कटघरे में खड़ा कर सकें तथा भारतीय मूल्यों के प्रति युवाओं के मन में भ्रम फैला सकें। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा और नीट पेपर लीक की दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने इन भारत-विरोधी तत्वों, राजनीतिक विरोधियों को एक मौका उपलब्ध करा दिया। इन तत्वों के द्वारा छात्रों की वास्तविक चिंताओं और मांगों को ढाल बनाकर आंदोलन के मंच पर कब्जा कर लिया गया और वहां से देश के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अशिष्टता, गाली-गलौज और अमर्यादित आचरण का नग्न प्रदर्शन किया गया।
​यह ध्यान देने योग्य पहलू है कि जब छात्रों ने अपनी चिंताएं रखीं, तो केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालय ने अत्यंत संवेदनशीलता दिखाते हुए निर्णायक कदम उठाए। छात्रों के भविष्य की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानून बनाने की दिशा में काम शुरू हुआ और प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय की गई। इसके बावजूद, जंतर-मंतर पर आंदोलन का रुख सुधार या समाधान की ओर न जाकर अश्लीलता और राजनीतिक वैमनस्यता की ओर मोड़ा गया। 
इससे यह स्पष्ट होता है कि इन तत्वों का उद्देश्य छात्रों का हित साधना नहीं, बल्कि सरकार की साख पर हमला करना और पाठ्यक्रमों में शुरू हुए भारतीयता आधारित बदलावों को रोकना था।
​आंदोलन की आड़ में अभद्रता करने वाले और उन्हें संरक्षण देने वाले विपक्षी व वामपंथी तत्व अच्छी तरह जानते हैं कि केवल प्रशासनिक बदलावों से शिक्षा के भारतीयकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया को नहीं रोका जा सकता। यही कारण है कि उनका सीधा निशाना अब सरकार की उन राष्ट्रवादी नीतियों पर है जो देश को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही हैं। लेकिन विरोध के नाम पर अश्लीलता और अभद्रता की जो तस्वीरें सार्वजनिक हुईं, उन्होंने अंततः देश के आम परिवारों और समाज को शर्मसार ही किया है। जिन युवाओं एवं युवतियों के वीडियो फुटेज उनके परिजनों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों तक पहुंचे, वहां उन्हें बेहद आपत्तिजनक और शर्मनाक स्थितियों का सामना करना पड़ा है।
​यह पूरा घटनाक्रम देश के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है कि क्या विरोध और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के नाम पर भारतीय संस्कृति में अश्लीलता और भाषाई पतन को स्वीकार किया जा सकता है? भारत की शक्ति उसके नैतिक मूल्यों, मर्यादाओं और सांस्कृतिक विरासत में निहित है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा सरकार द्वारा शिक्षा में सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय गौरव को पुनर्स्थापित करने का जो प्रयास किया जा रहा है, वह देश के भावी नागरिकों को सुसंस्कृत और राष्ट्रप्रेमी बनाने के लिए अनिवार्य है।
 भारत-विरोधी तत्वों और औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त राजनीतिक ताकतों की ऐसी कुत्सित कोशिशों के बावजूद, देश का जागरूक समाज अब यह समझ चुका है कि राष्ट्र का निर्माण केवल डिग्रियों से नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ हमें नैतिक शिक्षा की भी अति आवश्यकता है।

लेखक विषय वस्तु लेखक हैं। आप देश और प्रदेश के नामचीन साहित्यकारों का साहित्य सृजन के क्षेत्र में निरंतर सहयोग कर रहे हैं।
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