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भारतीय लोकतंत्र के ध्रुव तारे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई

​डॉ राघवेंद्र शर्मा 
भारतीय राजनीति के आकाश पर अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र की भांति रहे, जिनकी चमक ने न केवल अपने दल को ऊर्जा दी, बल्कि पूरे राष्ट्र के लोकतांत्रिक पथ को आलोकित किया। वे भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ और महानतम नायकों में से थे, जिनके लिए दलीय सीमाओं से कहीं अधिक राष्ट्र की सीमाएं और उसकी अस्मिता सर्वोपरि थी। अटल जी के संपूर्ण राजनीतिक जीवन का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनके केंद्र में कभी सत्ता की लालसा नहीं रही, बल्कि सदैव राष्ट्रहित की वेदी पर उन्होंने अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों की आहुति दी। उनके लिए राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक पवित्र अनुष्ठान थी। एक प्रखर वक्ता, संवेदनशील कवि और दूरदर्शी राजनेता के रूप में उन्होंने सिद्ध किया कि वैचारिक मतभेदों के बीच भी देशहित के साझा लक्ष्यों को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि चाहे वे सत्ता के शीर्ष पर रहे हों या विपक्ष की कतारों में, उन्होंने कभी भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघा। उनके लिए संसद एक राजनीतिक अखाड़ा मात्र नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसा मंदिर था जहाँ संवाद के माध्यम से समाधान की खोज की जाती थी। वर्ष 1962 के युद्ध का कालखंड रहा हो या 1975 के आपातकाल का काला अध्याय, अटल जी ने तत्कालीन सरकारों की नीतियों की प्रखर आलोचना तो की, लेकिन संकट के समय देश की एकता और अखंडता पर कभी आंच नहीं आने दी। उनका यह विश्वास कि ‘लोकतंत्र में विरोध भी राष्ट्रसेवा का ही एक रूप है’, आज के दौर में भी राजनीतिक सुचिता का सबसे बड़ा मानदंड बना हुआ है।
​अटल जी के नेतृत्व कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा तब हुई जब उन्होंने 23 विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों को मिलाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का सफलतापूर्वक संचालन किया। भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों के प्रति जो अस्थिरता और अविश्वास का भाव था, उसे अटल जी ने अपने समावेशी व्यक्तित्व और समन्वयवादी दृष्टि से स्थायित्व में बदल दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि गठबंधन की राजनीति केवल विवशता नहीं, बल्कि विविधताओं वाले देश में सर्वसम्मति की शक्ति बन सकती है। उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए निर्णय केवल तात्कालिक लाभ के लिए नहीं थे, बल्कि वे भविष्य के उस भारत की नींव थे जो आज दुनिया के सामने एक आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में खड़ा है। उनके द्वारा शुरू की गई 'स्वर्णिम चतुर्भुज योजना' ने देश के भौगोलिक फासलों को ही कम नहीं किया, बल्कि उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को एक आर्थिक सूत्र में पिरो दिया। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों को उच्च-गुणवत्ता वाले राजमार्गों से जोड़ने की इस दूरदर्शी सोच ने भारत के परिवहन और रसद क्षेत्र में जो क्रांति पैदा की, उसका लाभ आज भारतीय अर्थव्यवस्था को निरंतर मिल रहा है। बुनियादी ढांचे के विकास के प्रति उनका यह समर्पण ही था जिसने भारत को एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में पहला बड़ा कदम बढ़ाया।
​अटल जी के साहसिक नेतृत्व का सबसे गौरवशाली क्षण मई 1998 में आया, जब राजस्थान के पोखरण की तपती रेतीली धरती पर भारत ने पांच परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। यह केवल विज्ञान का सफल परीक्षण नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभुता और सामरिक स्वावलंबन का उद्घोष था। पश्चिमी देशों के दबाव और प्रतिबंधों की परवाह किए बिना अटल जी ने इस निर्णय के माध्यम से विश्व में शक्ति संतुलन को भारत के पक्ष में मोड़ने का कार्य किया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि भारत एक शांतिप्रिय राष्ट्र है, लेकिन अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ वह कभी समझौता नहीं करेगा। इसी कालखंड में उन्होंने तकनीक के महत्व को पहचानते हुए 1999 की नई दूरसंचार नीति के माध्यम से डिजिटल इंडिया की आधारशिला रखी। शहर और गांवों के बीच की डिजिटल खाई को पाटने की उनकी कोशिशों ने ही आज हर भारतीय के हाथ में इंटरनेट और सूचना की शक्ति प्रदान की है। इसी तरह, 'सर्व शिक्षा अभियान' के माध्यम से उन्होंने शिक्षा को हर बच्चे का अधिकार बनाया। 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की पहल ने न केवल साक्षरता दर में वृद्धि की, बल्कि करोड़ों बच्चों के भविष्य के द्वार खोल दिए। अटल जी का मानना था कि शिक्षित नागरिक ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं, और उनकी यह सोच आज भी भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार स्तंभ बनी हुई है।
​अटल जी केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शांति और सह-अस्तित्व के महान पुजारी थे। पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के साथ कटुतापूर्ण संबंधों के बावजूद उन्होंने शांति की पहल करने में कभी संकोच नहीं किया। कारगिल युद्ध से ठीक पहले 'दिल्ली-लाहौर बस यात्रा' का उनका ऐतिहासिक निर्णय उनकी इसी शांतिप्रिय और पड़ोसी प्रथम की नीति का परिचायक था। उन्होंने अपनी बस यात्रा के माध्यम से यह संदेश दिया कि इतिहास को बदला नहीं जा सकता, लेकिन भूगोल के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व संभव है। वहीं दूसरी ओर, रूस जैसे पारंपरिक मित्र के साथ संबंधों को एक नई ऊंचाई प्रदान करते हुए उन्होंने सामरिक साझेदारी को संस्थागत रूप दिया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ वार्षिक शिखर सम्मेलनों की शुरुआत और रक्षा-व्यापार में समझौतों ने भारत की विदेश नीति को और अधिक मजबूती दी। 
अमेरिका के साथ संबंधों के मामले में अटल जी ने अत्यंत परिपक्वता का परिचय दिया। परमाणु परीक्षण के बाद जब अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए, तब अटल जी ने न तो घुटने टेके और न ही संबंधों को पूरी तरह टूटने दिया। उन्होंने स्पष्ट और तर्कपूर्ण संवाद के माध्यम से अमेरिका को यह विश्वास दिलाया कि भारत का परमाणु कार्यक्रम किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि आत्मरक्षा के लिए है। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के दौरान रिश्तों में जमी बर्फ पिघली और भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। अटल जी की उसी कुशल कूटनीति का विस्तार 2008 में भारत को एनएसजी से मिली विशेष छूट के रूप में दिखाई दिया, जिसने भारत को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार परमाणु संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित कर दिया।
​अटल बिहारी वाजपेयी का युग भारतीय इतिहास का वह समय था जब देश ने अपनी हीनभावना को त्याग कर एक आत्मविश्वासपूर्ण महाशक्ति बनने की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने राजनीति में शुचिता, राष्ट्रहित के प्रति अटूट निष्ठा और विरोधियों के प्रति सम्मान का जो प्रतिमान स्थापित किया, वह आज की पीढ़ी के नेताओं के लिए एक प्रकाश स्तंभ है। अटल जी शारीरिक रूप से आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी 'अंत्योदय' की भावना, परमाणु शक्ति का गौरव, सड़कों का जाल और बच्चों के हाथों में थमाई गई शिक्षा की मशाल सदैव उनके जीवंत होने का प्रमाण देती रहेगी। वे सही मायने में भारत माता के अनमोल रत्न थे, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व की गरिमा से प्रधानमंत्री पद की गरिमा को और अधिक बढ़ाया। उनके द्वारा रखे गए विकास और कूटनीति के ये पत्थर आज भी भारत को एक विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर कर रहे हैं। अटल जी का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता आती-जाती रहेगी, दल बनेंगे और बिगड़ेंगे, लेकिन राष्ट्र अजर-अमर रहना चाहिए। उनकी स्मृतियों को संजोने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यही है कि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए एक सशक्त, समृद्ध और समावेशी भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।
लेखक मध्य प्रदेश बाल कल्याण आयोग के पूर्व अध्यक्ष, मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के निवृतमान प्रदेश कार्यालय मंत्री तथा वर्तमान में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के "मन की बात" के प्रदेश संयोजक हैं. राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के अनेक ग्रंथों का सृजन करने का श्रेय लेखक को प्राप्त है।
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