१९६० से ७० के दशक में, हर शुक्रवार को विद्यालयों में सरस्वती पूजा होती थी। चना एवं गुड़ का प्रसाद पाकर बच्चे बहुत प्रसन्न होते थे। छात्रों को बस यही पता था कि 'सरस्वती ज्ञान की देवी हैं'। किन्तु उस समय विद्यालय के छात्रों को किंचित भी अनुमान नहीं था कि ज्ञान शब्द का क्या अर्थ है, विद्यार्थी किसे कहते हैं। सरस्वती नदी थी ही नहीं इसलिए हमारी भारतीय सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता कहलाई, यही इतिहास की पुस्तकों में लिखा गया।
१९८० से १९९० के दशक में, माननीय मोरोपंत पिंगले और विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. वाकणकर (उज्जैन) ने सरस्वती शोध यात्रा निकाली। यह पहल जगाधरी के प्रसिद्ध उद्योगपति पद्मश्री दर्शनलाल जैन और चेन्नई के शोधार्थी श्रीमान कल्याण रमन ने की थी। उनके जैसे कई लोगों के प्रयास सफल हुए और आज भारतीय यह कहने की स्थिति में हैं कि सरस्वती नदी थी और भारतीय सभ्यता सरस्वती नदी के किनारे उद्भूत हुई।
२०१५ में 'हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड' बनने के बाद से, सरस्वती नदी को फिर से जीवित करने और उसका बहाव ठीक करने के प्रयास किए गए। सरस्वती नदी जींद से फतेहाबाद और सिरसा तक ४०० कि.मी. फैली हुई है। पिछले तीन सालों से वहां पानी का प्रवाह अबाधित है।
रियाणा में खोदे गए सभी पुरातत्वीय स्थान सरस्वती नदी के पैलियो-चैनल पर हैं, चाहे वह राखीगढ़ी हो, कुणाल हो या भिराना। १९९० के दशक में दो स्थानों पर, बहोली और भगवानपुर की खुदाई की गई थी। यहां मिली रेत राजस्थान और गुजरात में सरस्वती नदी के किनारे मिलने वाली रेत जैसी ही है। यहां की रेत इतनी पोरस है कि यह पानी को तुरंत निकाल देती है।
*सरस्वती सभ्यता का आरम्भ -
IIT रुड़की, GSI, ONGC, ISRO, NIH, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, सेंट्रल ग्राउंडवाटर बोर्ड इत्यादि और दूसरे वैज्ञानिक संस्थान (जैसे - आर्कियोलॉजी, जियोलॉजी, हाइड्रोलॉजी, ग्लेशियोलॉजी, रिमोट सेंसिंग, ग्राउंडवाटर इत्यादि) ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि सरस्वती नदी अस्तित्व में थी। सैटेलाइट इमेज, ग्राउंडवाटर रिसर्च, भिन्न-भिन्न शोध, सर्वे ऑफ़ इंडिया के मानचित्र और रेवेन्यू रिकॉर्ड सरस्वती के असली होने को प्रमाणित करते हैं। ऋग्वेद में सरस्वती के लिए "अम्बितमे, नदीतमे और देवीतमे" जैसे विशेषण प्रयोग किए गए हैं। हमारी सबसे पुरानी सभ्यता के विकास में सरस्वती नदी का विशेष स्थान है।
सरस्वती नदी छह करोड़ साल से भी अधिक समय तक बहती थी। भूपरिवर्तनों के कारण लगभग १६०० किलोमीटर लम्बी हिमालय से सिन्धु सागर तक बहने वाली सरस्वती नदी का पानी सूख गया। अब तक प्रकाशित हुए शोध से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह घटना ईसा पूर्व लगभग ४००० वर्ष से पहले हुई होगी। कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने महाभारत युद्ध में हिस्सा नहीं लिया था। उस समय वे सरस्वती नदी के किनारे तीर्थ यात्रा पर थे, जैसा कि वामन पुराण में बताया गया है।
सरस्वती नदी हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र के बंदरपूंछ हिमनद से निकलती है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहते हुए, यह नदी हरियाणा के यमुनानगर जिले में शिवालिक पर्वत श्रृंखला के नीचे आदिबद्री में भूमि पर अवतरित होती है। इसके किनारों पर कुरुक्षेत्र, रसूला, सिरसा, कालीबंगन, पीलीबंगा, सूरतगढ़, पेहोवा इत्यादि नगर बसे। पेहोवा नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा है। ऋग्वेद में बताया गया है कि पृथु ने अपने पिता की मृत्यु के बाद १२ दिनों तक उनसे मिलने आने वालों को सरस्वती का पानी पिलाया था। मार्कंडेय, वशिष्ठ, विश्वामित्र, पराशर, याज्ञवल्क्य, च्यवन, कपिल इत्यादि ऋषियों के आश्रम सरस्वती नदी के किनारे थे। यह नदी पंजाब, राजस्थान, गुजरात राज्यों से होकर बहती है और कच्छ के रण में समुद्र से मिलती है। इस नदी के किनारे १२०० से अधिक गाँव बसे हुए थे। इस नदी की चौड़ाई ३ से १२ किलोमीटर के बीच पाई जाती है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि नदी कितनी बड़ी रही होगी।
ऋग्वेद में सरस्वती नदी का उल्लेख ७५ बार मिलता है। वहीं, गंगा का केवल एक बार मिलता है। व्यास ने आदि बद्री में भागवत पुराण की रचना की थी। महाभारत में उल्लेख है कि महाभारत का युद्ध सरस्वती और दृषद्वती दो नदियों के बीच की भूमि पर लड़ा गया था। पूरे युद्ध के मैदान को कुरुक्षेत्र कहा जाता है। इस नदी ने कभी राजस्थान के रेगिस्तान को हरा-भरा कर दिया था। लोगों की मांग है कि इस नदी को फिर से जीवित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष -
सरस्वती नदी के तट पर भारतीय सभ्यता का विकास हुआ, सिंधु के तट पर नहीं। जिन्हें संस्कृत आती नहीं वें सिंधु को स्त्रीलिंग शब्द मानते हैं। किन्तु है वह पुंल्लिग शब्द। उसका अर्थ होता है 'सागर या समुद्र'। सरस्वती का पानी सूखने के बाद तटीय लोग अन्यत्र चले गये। किन्तु उनमें से कुछ ने अपनी स्मृति में सरस्वती जीवित रहे इसलिए अपने आप को सारस्वत कहना आरम्भ किया।
*विद्या -
ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा हेमंत ऋतु में, माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को की जाती है। इस तिथि को वसंत पंचमी भी कहते हैं। यह पूर्वी भारत का एक सामाजिक त्योहार है।
तेलंगाना राज्य में गोदावरी नदी के किनारे 'बासर' गांव में एक सरस्वती मंदिर है। वहां वसंत पंचमी पर बच्चों के 'विद्यारम्भ संस्कार' के लिए बड़ी संख्या में लोग बासर पहुंचते हैं।
विद्या शब्द की परिभाषा विष्णु पुराण में इस प्रकार दी गई है "सा विद्या या विमुक्तये"। यानी विद्या उसे कहते हैं जो मुक्ति दिलाए। अभी जो शिक्षा विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में दी जाती है, वह 'नियुक्ति' दिलाती है, मुक्ति नहीं। भारत के बाहर जो शास्त्र विकसित हुए, वे सभी नश्वर जगत से जुड़े हैं। शिक्षा में वही शास्त्र सम्मिलित हैं - जैसे, भौतिकी, रसायन, जीवशास्त्र, वनस्पति शास्त्र इत्यादि।
भारत में, दोनों तरह के शास्त्र विकसित हुए हैं - भौतिक और अभौतिक। अभौतिक शास्त्र केवल संस्कृत महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते हैं।
*अलौकिक शास्त्र -
माधवाचार्य द्वारा लिखी गये 'सर्वदर्शन संग्रह' नामक ग्रन्थ में संस्कृत भाषा में उपलब्ध १६ दर्शनों के बारे में बताया गया है। इनमें चार्वाक दर्शन के अलावा 15 और भी हैं।
अलौकिक शास्त्र -
माधवाचार्य की लिखी किताब 'सर्व दर्शन संग्रह' में संस्कृत भाषा में १६ दर्शन बताए गए हैं। चार्वाक दर्शन के अलावा, बाकी १५ दर्शन मुक्ति, समाधि, मोक्ष, कैवल्य, निर्वाण की ओर इशारा करते हैं। वें १५ शास्त्र विद्या कहलाते हैं। इनमें से कम से कम एक को सीखना और उसके हिसाब से जीना विद्या की उपासना करना है, अर्थात् सरस्वती की पूजा करना है। इसके लिए पहले संस्कृत भाषा और फिर व्याकरण सीखना होगा, तभी कोई शास्त्र में प्रवेश कर सकता है।
इसलिए, सभी पढ़ने वालों से मेरा अनुरोध है कि वसंत पंचमी से संस्कृत सीखना आरम्भ करें और निश्चित करें कि मैं एक शास्त्र अवश्य सीखूंगा।
लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसांगिक संगठन संस्कृत भारती के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख हैं।
shreeshdeopujari@gmail.com

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