Header Ads Widget

Responsive Advertisement

Ticker

6/recent/ticker-posts

शिक्षा, नीति और संवेदनहीनता : भारत में उच्च शिक्षा का अंतर्विरोध


*लेखक - डॉ. बृजेश कुमार*
भारत की प्राचीन शिक्षा-परंपरा तक्षशिला और नालंदा जैसे वैश्विक ज्ञान-केंद्रों से समृद्ध रही है, किंतु आधुनिक भारत में शिक्षा का स्वरूप इस विरासत के अनुरूप विकसित नहीं हो सका। स्वतंत्रता के बाद शिक्षा संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, परंतु यह विस्तार गुणवत्तात्मक प्रगति में परिवर्तित नहीं हो पाया। आज भारतीय शिक्षा प्रणाली एक गहरे वैचारिक और संरचनात्मक संकट से गुजर रही है।

औपनिवेशिक काल में स्थापित शिक्षा-दृष्टि का उद्देश्य ज्ञान-सृजन के बजाय प्रशासनिक सुविधा था, जिसका प्रभाव आज भी बना हुआ है। स्वतंत्र भारत इस ढाँचे से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सका। सामाजिक असमानताएँ—विशेषकर जाति, वर्ग और लिंग आधारित—शिक्षा तक समान पहुँच में बाधा बनी रहीं। शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के साधन के बजाय केवल रोजगार-उन्मुख बना दिया गया, जिससे बौद्धिक और नैतिक विकास गौण हो गया।

नीतिगत स्तर पर भी रटंत और परीक्षा-केन्द्रित प्रणाली ने आलोचनात्मक चिंतन और शोध-संस्कृति को कमजोर किया है। भाषा का प्रश्न, सार्वजनिक निवेश की कमी और विश्वविद्यालयों का बढ़ता प्रशासनिक बोझ इस संकट को और गहरा करता है।अतः शिक्षा सुधार केवल संस्थागत नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्संरचना की माँग करता है। जब तक शिक्षा को डिग्री और रोजगार से आगे बढ़ाकर राष्ट्र-निर्माण और चिंतनशील नागरिकता के साधन के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रहेगा।

भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था आज जिस गहन संकट से गुजर रही है, उसका सबसे त्रासद संकेत छात्रों की बढ़ती आत्महत्याएँ हैं। राष्ट्रीय आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत मानसिक दुर्बलता का परिणाम नहीं, बल्कि शैक्षिक नीतियों, संस्थागत संस्कृति और सामाजिक असमानताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। इस संदर्भ में UGC की शिक्षा प्रक्रिया और उसके नीतिगत ढाँचे की आलोचनात्मक समीक्षा अपरिहार्य हो जाती है।
निरंतर प्रदर्शन का मानसिक बोझ शिक्षार्थियों के लिए अधिक घातक सिद्ध होता है, जो पहले से ही सामाजिक, भाषायी और सांस्कृतिक बाधाओं से जूझ रहे होते हैं।
छात्र आत्महत्याओं के मामलों में यह बार-बार सामने आया है कि अकादमिक असफलता, संस्थागत अलगाव, रैगिंग, भेदभाव और परामर्श तंत्र की असंवेदनशीलता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। दुर्भाग्यवश, UGC की नीतियों में मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी सहायक (auxiliary) विषय के रूप में देखा जाता है, न कि शिक्षा प्रक्रिया के केंद्रीय घटक के रूप में। काउंसलिंग सेल की औपचारिक उपस्थिति पर्याप्त मानी जाती है, जबकि संवेदनशील मनोवैज्ञानिक सहायता का अभाव बना रहता है।आत्महत्या किसी एक छात्र की हार नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता होती है। यदि UGC की शिक्षा प्रक्रिया मानवीय संवेदना, समावेशन और मानसिक स्वास्थ्य को केंद्र में नहीं लाती, तो उच्च शिक्षा सामाजिक सशक्तिकरण के बजाय सामाजिक क्षति का कारण बनती जाएगी।

भारत में शिक्षा को सामाजिक उत्थान और राष्ट्र-निर्माण का माध्यम माना गया है, किंतु हाल के वर्षों में छात्रों की बढ़ती आत्महत्याएँ इस आदर्श के भीतर गहरे संरचनात्मक संकट की ओर संकेत करती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार एक दशक में यह संख्या लगभग 60–65 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जो मात्र व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि प्रणालीगत दबावों का परिणाम प्रतीत होती है।

IIT, IIM, NIT और केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में 2018–2023 के बीच 98 छात्रों की आत्महत्या इस धारणा को चुनौती देती है कि “उत्कृष्ट संस्थान” मानसिक सुरक्षा की गारंटी होते हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन, अकादमिक अलगाव, रैगिंग, तथा काउंसलिंग की अपर्याप्त व्यवस्था इन संस्थानों में तनाव को गहरा करती है। संकीर्ण परिभाषा और भेदभाव की अदृश्य संरचनाएँ छात्रों को अधिक मानसिक जोखिम में डालती हैं।
छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती दर यह स्पष्ट करती है कि शिक्षा का वर्तमान मॉडल मानवीय संवेदनशीलता से अधिक बाज़ार-तर्क और प्रतिस्पर्धा से संचालित हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा नीति में मानसिक स्वास्थ्य को केंद्रीय स्थान दिया जाए, समावेशी वातावरण सुनिश्चित किया जाए और आँकड़ों की पारदर्शिता के साथ उत्तरदायित्व तय किया जाए।

स्वतंत्र भारत में शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक संस्थागत विस्तार हुआ है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा IIT, IIM, AIIMS जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की स्थापना ने यह संकेत दिया कि भारत ज्ञान-आधारित समाज की ओर अग्रसर है। किंतु यह विस्तार अपने साथ एक गहरा अंतर्विरोध भी उजागर करता है—शैक्षिक गुणवत्ता की कमी और संपूर्ण समाज का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व। यह स्थिति केवल शिक्षा की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा के समक्ष भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

उच्च शिक्षा में आज सफलता का मूल्यांकन ज्ञान-सृजन और शोध के स्थान पर प्लेसमेंट, रैंकिंग और वेतन-पैकेज से किया जाने लगा है। इस बाज़ार-केन्द्रित दृष्टि ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के साधन के बजाय निजी सफलता का माध्यम बना दिया है। इसका प्रतिकूल प्रभाव समाज पर विशेष रूप से दिखाई देता है, जो ऐतिहासिक वंचना, कमजोर प्रारंभिक शिक्षा, संसाधनों की कमी और भाषा-संबंधी बाधाओं के कारण उच्च शिक्षा तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता। समान अवसर का सिद्धांत व्यवहार में असमान प्रतिस्पर्धा में बदल जाता है। आरक्षण और प्रतिनिधित्व को गुणवत्ता-विरोधी मानना शिक्षा की सामाजिक भूमिका को न समझ पाने का परिणाम है।

भारत में उच्च शिक्षा को सामाजिक न्याय का सशक्त माध्यम माना जाता है, किंतु व्यवहार में यही क्षेत्र आज गहरी असमानता और बहिष्करण का केंद्र बनता जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अंतर्गत संचालित शिक्षक चयन प्रणाली—जो निष्पक्षता, पारदर्शिता और ‘मेरिट’ का दावा करती है—वास्तव में संस्थागत भेदभाव और संरचनात्मक भ्रष्टाचार से ग्रस्त दिखाई देती है।
इस व्यवस्था का सबसे चिंताजनक पक्ष आरक्षण नीति का संस्थागत अवमूल्यन है। आरक्षित श्रेणियों के पद वर्षों तक रिक्त रखे जाते हैं, पदों को भरने के लिए न तो कोई समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाती है और न ही किसी स्तर पर उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाता है। परिणामस्वरूप आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार न रहकर प्रशासनिक विवेक पर निर्भर ‘अनुग्रह’ में बदल जाता है, जो संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।

चयन प्रक्रिया के साक्षात्कार और अकादमिक मूल्यांकन चरण में भी सूक्ष्म किंतु प्रभावी भेदभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जातिगत आत्मविश्वास जैसे गैर-अकादमिक तत्व निर्णायक मानदंड बन जाते हैं, जबकि वास्तविक अकादमिक गुणवत्ता और बौद्धिक योगदान को गौण कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति ज्ञान-उत्पादन की बहुलता और विविधता पर सीधा आघात है।
स्पष्ट है कि समस्या केवल नियमों या दिशा-निर्देशों की नहीं, बल्कि उस संरचनात्मक मानसिकता की है जो उच्च शिक्षा को अब भी विशेषाधिकार के क्षेत्र के रूप में देखती है। जब तक चयन समितियों में सामाजिक विविधता सुनिश्चित नहीं होती, आरक्षण अनुपालन की स्वतंत्र निगरानी नहीं होती और मूल्यांकन प्रणाली पारदर्शी नहीं बनती, तब तक उच्च शिक्षा समानता का साधन नहीं, बल्कि विशेषाधिकारों के पुनरुत्पादन का माध्यम बनी रहेगी।

अतः भारत में शिक्षा का संकट गुणवत्ता और समावेश—दोनों का संयुक्त प्रश्न है। समाज की प्रभावी भागीदारी के बिना न तो शैक्षिक उत्कृष्टता संभव है और न ही लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया पूर्ण हो सकती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ