डॉ राघवेंद्र शर्मा।
भारतीय वेद, शास्त्र, पुराण एवं अन्य ग्रंथ, इस सत्य को प्रतिपादित करते रहे हैं कि यदि मनुष्य चाहे तो स्वयं को अपने सत्कर्मों के द्वारा देव तुल्य श्रेणी में स्थापित कर सकता है। सतयुग से लेकर कलयुग तक अनेक महा मानवों ने अपने पुरुषार्थ से इस सत्य को चरितार्थ भी किया है। जिनके नाम पर अनेक ग्रंथ लिखे गए। जिन्हें आदर्श मानकर अनेक क्रांतियां खड़ी हो गईं और जब परिणाम सकारात्मक मिले तो इन महापुरुषों के मंदिर भी बनाए गए। ऐसी ही एक विभूति का नाम है डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार। सभी जानते हैं कि डॉक्टर केशव बलिराम हैडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदि सर संघ चालक हैं। उनके द्वारा संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन 1925 में तब की गई, जब भारतीय राजनेता हिंदू और मुसलमान में फूट डालकर अपना मतलब साधने में संलग्न होने लगे थे। जब यह कहा जाने लगा कि मुसलमानों के सहयोग बगैर भारत को स्वतंत्र नहीं कराया जा सकता। तब डॉक्टर साहब की समझ में यह बात भली भांति आ गई थी की ऐसा कहकर या तो मुस्लिम समाज को गैर भरोसेमंद तबका साबित कर उसे बगावत के लिए उकसाया जा रहा है। या फिर उसकी स्वाभाविक भूमिका को अतिरिक्त महत्व देकर उसकी अति महत्वाकांछाओं को हवा दी जा रही है। दोनों ही सूरत में नुकसान भारत का होना था। यह सोच मुसलमान के मन में हिंदू के प्रति वितृष्णा पैदा कर राजनीतिक लाभ अर्जित करने की थी। परिणाम स्वरूप सांप्रदायिक सद्भाव के छिन्न-भिन्न होने की आशंकाएं प्रबल दिखाई देती थीं । तत्कालीन अधिकांश राजनेता या तो इस कड़वी सच्चाई को समझ नहीं पाए। या फिर ना समझ होने का स्वांग रचते रहे। ताकि इस विकृत सोच को स्थापित करने वाले तथाकथित महान नेताओं की नजरों में स्वयं को वफादार साबित किया जा सके। लेकिन डॉक्टर साहब भविष्य की भयावह परिणीति को भांप चुके थे। यही कारण है कि उन्होंने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की और हिंदुओं को एकजुट करने, उनका आत्मविश्वास जगाने, आत्म सम्मान को बचाए रखने की जिजीविषा को जागृत करने में जुट गए। मुट्ठी भर लोगों के साथ नागपुर में प्रारंभ की गई संघ की प्रथम शाखा को लेकर उनका बड़े स्तर पर उपहास उड़ाया गया। कहा गया - यह दो-चार लोग भारत का भविष्य बदलने निकले हैं। आजादी का श्रेय लेने की होड़ में मरे जा रहे स्वयंभू राष्ट्रभक्तों ने उनके इस प्रयास पर देशद्रोही होने, समाज को तोड़ने, सांप्रदायिकता फैलाने आदि जैसे दोष लगाने के अभियान निरंतर चलाए। लेकिन डॉक्टर हेडगेवार ना रुके ना थके। उनके इस दृढ़ संकल्प और सकारात्मक योजनाओं, देश के उज्जवल भविष्य, विकसित भारत की कल्पनाओं को देखते हुए स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण धीरे-धीरे ही सही लेकिन बढ़ता चला गया। भारत की आधी अधूरी आजादी के साथ वह सच भी सामने आ गया, जिसके प्रति डॉक्टर साहब लगातार देश को सचेत करते चले आ रहे थे। वह सच्चाई थी राजनेताओं की अति महत्वाकांक्षाओं का हिंदू मुस्लिम दंगे के रूप में सामने आना और भारत के टुकड़े हो जाना। तब पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खुलकर अपना पराक्रम दिखाया और पाकिस्तान की ओर से लुटपिट कर आने वाली हिंदुओं को यहां बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस घटना ने संघ के प्रभाव को जन-जन के मन मस्तिष्क तक पहुंचा दिया। फल स्वरुप स्वयं को देश का पालनहार साबित करने में जुटे तत्कालीन सत्ताधारी नेता बौखला उठे। उनकी इसी बौखलाहट का परिणाम था कि जब एक बेहद आवेशित व्यक्ति द्वारा गांधी जी की हत्या की गई तो उसका दोष संघ के माथे पर मढ़ा गया ताकि उसे एक सुनियोजित साजिश के तहत प्रतिबंधित किया जा सके। ऐसा हुआ भी, लेकिन सभी प्रकार की न्यायिक जांचों और मुकदमों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेदाग होकर और ज्यादा निखर उठा। उसके स्वयंसेवक लगातार भारतीय संप्रभुता और राष्ट्र प्रथम का नारा लेकर देश सेवा में जुटे रहे। वक्त भारत पाक युद्ध का हो या फिर चीन से लोहा लेने का, संघ के स्वयंसेवक प्रत्येक हालत में देश की जनता के साथ डटे रहे। इस बीच जब-जब प्राकृतिक विभीषिकाएं सूखा, बाढ़, तूफान, भूकंप, हिमस्खलन आदि के रूप में सामने आईं,तब मानव सेवा के क्षेत्र में संघ को अगली पंक्ति में देखा गया। उसने कभी देखा ही नहीं, जिसकी सहायता की जा रही है वह किस जाति, धर्म अथवा संप्रदाय का है। ध्येय केवल एक था, जिसे सहायता और सेवा की जरूरत है उस तक वह हर हाल में पहुंचनी चाहिए और पहुंची भी। संघ का यह स्वरूप देश को भाया तो उसकी पहुंच भाषा और प्रांत की सीमाओं को लांघते हुए समूचे देश और यहां तक कि विश्व की अनेक शक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करती चली गयी। जब 1975 में देश पर आपातकाल थोपा गया तब देशभर के स्वयंसेवकों ने सरकार की ईट से ईट बजा दी। गिरफ्तारियां देकर सभी जेलें भर दी गईं। सरकार द्वारा स्वयं सेवकों को अमानवीय यातनाएं देकर प्रताड़ित किया गया। लेकिन वह नहीं टूटे और देशभक्त ताकतों के साथ मिलकर राष्ट्र को आपातकाल के अंधकार से बाहर निकाल कर ही माने। यहां तक अनेक प्रतिकूलताओं का सामना करते-करते संघ राष्ट्र विरोधी ताकतों के लिए वज्र के समान कठोर हो चुका था। जबकि राष्ट्र नायकों के प्रति उसकी संवेदनाएं बेहद संवेदनशील बनी रहीं। जैसा कि सब जानते हैं संघ ने राजनीति में प्रत्यक्ष ना आने का संकल्प ले रखा था। लगातार उपेक्षा के शिकार हो रहे हिंदुओं की आवाज को विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं एवं देश की लोकसभा तक मुखरता से उठाया जा सके। इसके लिए एक स्वतंत्र संगठन के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना संघ की प्रेरणा से ही हुई जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आई। यह संघ के त्याग और तपस्या का ही फल था कि वह विश्व का सबसे बड़ा हिंदू संगठन है। जबकि उसी से प्रेरणा लेकर राष्ट्र प्रथम का सूत्र हाथ में लिए आगे बढ़ रही भारतीय जनता पार्टी राजनीति के क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहलाई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन जन तक सेवा के प्रकल्प पहुंचाने के लिए अनेक अनुसांगिक संगठन खड़े किए, जो सेवा, सुरक्षा, संस्कार, शिक्षा आदि के क्षेत्र में आज भी जी जान से लगे हुए हैं। आज संघ के करोड़ों करोड़ स्वयंसेवक, लाखों पदाधिकारी और उसके आदि सर संघ चालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनका कीर्ति ध्वज स्वर्ण पताका बनकर भारत और समूचे विश्व में अपने आलोक से राष्ट्रभक्ति के भाव को आलोकित कर रही है। निसंदेह दक्षिण भारत क्षेत्र में स्थित उनके पैतृक गांव तेलंगाना के निज़ामाबाद जिले के कंदकुर्थी गांव में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार का बेहद मनमोहक स्मृति मंदिर आकर ले चुका है। जिसके उच्च तल पर स्थापित भारत माता की प्रतिमा मंदिर के समूचे प्रांगण को आशीषित करती दिखाई देती हैं। राष्ट्रभक्ति के केंद्र बिंदु के रूप में इस मंदिर का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सर संघ चालक श्री मोहन भागवत द्वारा किया जा चुका है। यह मंदिर प्रतिबिंब है उन निष्ठाओं और समर्पण भावों का जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति करोड़ स्वयंसेवकों के हृदय में स्पंदन बनकर धड़क रहा है।

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