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नारी सम्मान की संकल्प युक्त घट स्थापना ही मां भगवती की सच्ची पूजा

नारी सम्मान की संकल्प युक्त घट स्थापना ही भगवती की सच्ची पूजा

डॉक्टर राघवेंद्र शर्मा। 
चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होने वाला नवरात्र का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, अध्यात्म, इतिहास और मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा अद्भुत संगम है जो भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता को वैश्विक पटल पर रेखांकित करता है। जब हम वसंत की इस बेला से गुजर रहे होते हैं, तो संपूर्ण चराचर जगत एक नवीन चेतना से ओतप्रोत दिखाई देता है। प्रकृति स्वयं को पुराने पत्तों के त्याग और नवीन पल्लवों के शृंगार से सजाती है, जो इस बात का प्रतीक है कि जीवन निरंतर परिवर्तनशील और पुनर्जीवन की क्षमता से युक्त है। खेतों में लहलहाती स्वर्णमयी फसलें जब खलिहानों से होते हुए घरों और मंडियों तक पहुँचती हैं, तो यह समृद्धि केवल आर्थिक संपन्नता का संकेत नहीं होती, बल्कि यह उस ईश्वरीय कृपा का प्रसाद होती है जो हमें पोषण प्रदान करती है। इसी पावन समय में हम विक्रम संवत के नव वर्ष का स्वागत करते हैं, जो हमें अपनी उस महान सभ्यता और काल-गणना की वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ता है जिसे हमारे ऋषियों ने युगों पूर्व स्थापित किया था। आध्यात्मिक दृष्टि से यह वह दिन है जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था, अर्थात यह अस्तित्व के आरंभ का उत्सव है। प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक चलने वाला मां भगवती के नौ स्वरूपों का पूजन हमें उस पराशक्ति की ओर ले जाता है जिसने समय-समय पर आसुरी शक्तियों का दमन कर सज्जनों और देवताओं की रक्षा की। यह पूरा क्रम भारतीय दर्शन में नारी शक्ति की महत्ता को प्रतिपादित करने का एक जीवंत माध्यम है।
​ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे त्रिदेवों ने भी जिस शक्ति को जगत का आधार मानकर स्वीकार किया, वही शक्ति स्वरूपा नारी भारतीय समाज की धुरी रही है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' का उद्घोष केवल ग्रंथों की शोभा बढ़ाने वाला वाक्य नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवन मूल्य रहा है जिसे सनातन संस्कृति ने युगों-युगों से जिया है। परंतु, आज के संदर्भ में जब हम अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करते हैं, तो साथ ही एक गहरी पीड़ा का अनुभव भी होता है। जिस देश में देवी को मां मानकर शीश नवाया जाता है, वहाँ आज आधी आबादी का असुरक्षित महसूस करना हमारे आध्यात्मिक पतन का संकेत है। आज समाचारों के पन्नों पर बच्चियों से लेकर वृद्ध महिलाओं तक पर होने वाले अत्याचारों की कथाएं हमारे संस्कारों पर प्रश्नचिह्न खड़ी करती हैं। बलात्कार, दहेज की वेदी पर चढ़ती बलि और शैक्षणिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद समाज में नारी को दोयम दर्जे का समझा जाना, यह सभी विसंगतियां उस संस्कृति के विरुद्ध हैं जो नारी को शक्ति का केंद्र मानती है। यह विचारणीय है कि यदि हम मां भगवती के मंदिरों में माथा टेकते हैं और बाहर निकलकर किसी स्त्री के सम्मान को ठेस पहुँचाते हैं, तो वह पूजा और वह भक्ति पूरी तरह निष्फल है। किसी भी रूप में नारी पर किया गया अत्याचार न केवल मानवीय दृष्टिकोण से जघन्य अपराध है, बल्कि यह साक्षात् सनातन परंपरा और हिंदू संस्कृति का अपमान है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो ऐसे कर्म हमारे लोक और परलोक दोनों को दूषित करते हैं, क्योंकि जिस हृदय में घृणा और हिंसा का वास हो, वहाँ ईश्वरीय चेतना कभी जागृत नहीं हो सकती।
​सच्चे अर्थों में नवरात्र का पर्व तभी सार्थक होगा जब हम कर्मकांडों से आगे बढ़कर अपनी वैचारिक शुद्धता पर ध्यान केंद्रित करेंगे। उपवास का अर्थ केवल अन्न का त्याग नहीं, बल्कि दूषित विचारों और कुप्रवृत्तियों का त्याग होना चाहिए। यदि हम प्रतिपदा के शुभ अवसर पर घट स्थापना करते हैं, तो हमें अपने अंतर्मन में संकल्प की स्थापना भी करनी होगी। यह संकल्प कि हम न केवल स्वयं नारी के प्रति मर्यादित और सम्मानजनक व्यवहार करेंगे, बल्कि समाज में नारी पर हो रहे किसी भी अन्याय का मौन दर्शक बनकर समर्थन नहीं करेंगे। नारी की अस्मिता की रक्षा करना केवल कानून का दायित्व नहीं है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति का धर्म है जो खुद को सनातनी कहता है। जब समाज का हर व्यक्ति नारी पर हो रहे अन्याय के विरुद्ध मुखर होकर खड़ा होगा और प्रतिकार की शक्ति दिखाएगा, तभी हम एक ऐसे वातावरण का निर्माण कर पाएंगे जहाँ भय का स्थान सम्मान ले सके। नारी केवल दया की पात्र नहीं, वह उस सामर्थ्य का नाम है जिससे सृष्टि का संचालन होता है। यदि हम उसकी शक्ति को स्वीकार कर उसे उचित स्थान दे पाएँ, तभी खेतों की हरियाली और मंदिरों की आरती हमारे जीवन में वास्तविक सुख और शांति ला पाएगी। अतः इस नवरात्र, आइए हम मां शैलपुत्री से लेकर मां सिद्धिदात्री तक की आराधना इस भाव के साथ करें कि हमारे समाज की हर बेटी और महिला सुरक्षित, समर्थ और सम्मानित महसूस करे। जब हमारे भीतर का यह सकारात्मक परिवर्तन धरातल पर उतरेगा, तभी यह माना जाएगा कि हमने वास्तव में मां भगवती का आह्वान किया है और नवरात्र के पावन पर्व को उसकी पूर्ण दिव्यता के साथ मनाया है। यह संकल्प ही हमारे नए संवत का सबसे बड़ा उपहार होगा जो हमें एक सभ्य और सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्व गुरु की गरिमा वापस दिलाएगा।
लेखक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात के मध्य प्रदेश के सयोजक हैं। आप विभिन्न समाजसेवी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के केंद्र बिंदु हैं। आपके द्वारा विभिन्न विषयों पर आधारित अनेक साहित्यों का सृजन किया गया है।
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