क्या कोरोना ने ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक है’’ की भावना को ‘‘तार-तार’’ तो नहीं कर दिया है?

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कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक

हमारा देश अनेकता में एकता लिये हुए ऐसा देश है, जिसमें भिन्न-भिन्न संस्कृति, राजनैतिक विचार धाराएं, धार्मिक आस्थाएं नदियों पहाड़ों व जंगलों के साथ सुंदर प्राकृतिक भौगोलिक संरचना होते हुये भी, एकता लिए हुए एक मजबूत देश है। कतिपय संवैधानिक प्रतिबंधों के साथ कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के नागरिक को कहीं भी घूमने की व जीने की स्वतंत्रता है।

देश की वर्तमान शासक पार्टी भाजपा की प्रांरभ से ही यही विचार धारा रही है कि, एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक प्रधानमंत्री व एक टेक्स (जीएसटी) हो। अब तो इससे आगे बढ़कर एक ही राशन काडऱ् को न केवल पूरे देश भर में लागू कर दिया गया है, बल्कि किसानों के लिए भी मंड़ी प्रागण क्षेत्र के प्रतिबंध को हटाकर पूरा देश एक ही बाजार की सुविधा भी लागू कर दी गई है।

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ऐसी एकता में विश्वास रखने वाली भाजपा नीत केन्द्र व राज्यों की सरकारों में इस कोरोना काल में उक्त एकता वाली भावना क्या कुछ-कुछ खंडित तो नहीं हो रही है? प्रश्न यह है।
याद कीजिए! जब देश व्यापी प्रवासी मजदूरों की समस्या सामने आई, तब केन्द्र सरकार ने उन्हे ट्रेन द्वारा अपने गृह नगर पंहुचाने के लिये संपूर्ण देश के लिये एकछत्र निर्णय न लेकर दो प्रदेशों (भेजने तथा पहंुचने वाले) की अनिवार्य सहमति की शर्त लगा दी थी। फिर इसमें संशोधन कर केवल पंहुचने वाले राज्य की सहमति की शर्त लगाई थी।

और अंत में इस शर्त को भी हटा दिया गया। इस प्रकार उक्त आदेश के द्वारा संपूर्ण देश एक क्षेत्र की अवधारणा का पहली बार खंडित होने का आभास हुआ, जिसकी न तो अपेक्षा थी और न आवश्यकता ही थी। इसके पश्चात आंकडांे़ के खेल के चक्कर में (कोरोना जो कि किसी राज्य की नहीं, बल्कि देश व विश्व की समस्या है) कोरोना के आंकड़ों को कम दिखाने की सोच के चलते, अपने राज्य की सीमा के भीतर, दूसरे राज्यों के नागरिकों के आने पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया। क्या यह प्रतिबंध देश की समरसता व ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक ही है’’ की भावना का द्योतक है?

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हद तो तब हो गई, जब देश का दर्पण कहे जाने वाले अर्ध्द लगड़े राज्य व देश की राजधानी दिल्ली ने भी अपने अस्पतालों में दूसरे राज्यों से आने वाले मरीजों के इलाज पर ही प्रतिबंध लगा दिया। जब कोरोना एक राष्ट्रीय समस्या है, तब संकट काल के इस दौर में एक दूसरे राज्यों के संसाधनों की कमी की पूर्ति राज्यों व केन्द्र को मिलकर क्यों नहीं करना चाहिए? बजाए इसके उक्त कमी पर प्रतिबंध लगाकर उसे दृष्टिगोचर बनाना न तो राष्ट्रीय हित में है और न ही यह देश की राष्ट्रीय एकता का प्रतीक हुआ।

प्रतिबंध का उद्देश्य व आधार ़संक्रमण को फैलने से रोकना है, न कि संक्रमित व्यक्ति को अपने प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भेजकर संक्रमितों की संख्या कम करना। इसलिये ऐसा प्रतिबंध देश में हॉटस्पॉट (रेड़ जोन क्षेत्र में) लगाना ही उचित होता, अन्य जगह नहीं। भविष्य में सरकार को इस तरह के प्रतिबंध लगाने से बचना चाहिये, जो एक नागरिक को अबाध रूप से देश के किसी भी भाग में जाने, रहने इत्यादि पर प्रतिबंध लगाता हो। जब तक अन्य कोई विकल्प न बचे और ऐसा करना राष्ट्रहित में आवश्यक न हो। साथ ही ऐसे प्रतिबंध केवल अस्थायी होने चाहिये।

राजीव खंडेलवाल
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार )

Email :- [email protected]
Blog:- www.aandolan.com

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