‘‘बस’’ का ‘‘लॉकडाउन समाप्त’’ कर ‘‘रोड़ पर लाना’’ शायद सरकार के ‘‘बस’’ में नहीं है?

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कोरोना रोकने दुबारा लॉकडाउन लगाने की जरूरत तो नहीं?

आप जानते ही है कि, राष्ट्रीय लॉकडाउन घोषित करते समय समस्त प्रकार के सार्वजनिक व निजी क्षत्रों के वाहनों के परिवहन पर प्रतिबंध लगाया गया था। ‘‘कोरोना काल’’ के अनलॉक-1 की अवधि में, कुछ विशिष्ट प्रकार की हवाई यात्राएं व स्पेशल ट्रेनों के आंशिक परिवहन की छूट दी गई है। जहां तक बस का प्रश्न है, मध्यप्रदेश में अभी तक बस के चक्के चलना प्रारंभ नहीं हुये हैं।

आप सभी जानते ही है कि, दूरस्थ ग्रामीण इलाकों तक में पहंुचने का एक मात्र साधन आज भी ‘‘बस’’ ही हैं, जो चाहें सार्वजनिक क्षेत्र की हो अथवा निजी क्षेत्र की हो। बस को रोड़ पर न ला पाने में मुख्य रूप से सरकार की नियत व दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी ही दिख रही हैं। बस मालिकों ने सरकार से माँग की थी कि, लॉकडाउन की अवधि में बसें रोड़ पर खड़ी रही है, अतः उनके रोड़ टैक्स में भी छूट दी जावें, साथ ही इंशोरेसं की अवधि को भी उतनी अवधि के लिये आगे बढ़ाया जाय।

लेकिन सरकार ने अभी तक उस पर कोई ध्यान नहीं दिया है। सरकार ने ‘‘बस’’ की अधिकतम क्षमता (50) सीटों की 50 प्रतिशत सीट अर्थात 25 सीटें भरकर ही बस चलाने का कहां है। जब सरकार स्वयं न तो रोड़ टैक्स को पूर्णतः माफ कर रही है और न ही उसे 50 प्रतिशत (50 प्रतिशत सीटों की सीमित संख्या की अनुमति को देखते हुये) कम कर रही है। तब बढ़ती हुई डीजल ,आईल व अन्य खर्चो को देखते हुये बस की उपरोक्त स्थिति में परिचालन कैसे संभव है?

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सोशल डिस्टेसिंग के लिये बीच की एक-एक वैकल्पिक सीट खाली रखने के निर्देश के कारण, पूर्व के निर्धारित उतने ही किराये पर बस का परिचालन करना किसी के लिये भी संभव नहीं होगा। इसके लिए तो सरकार को ऑपरेटरों के साथ बैठकर बढ़े हुये खर्चो (50 प्रतिशत सीटों के प्रतिबंध के कारण) को तीन बराबर भागों में अर्थात सरकार, बस आपरेटर व पैसेंजरों के बीच शेयर (बाँट) करना होगा, तभी बस का परिचालन संभव हो सकेगा।

एक बात की ओर ध्यान रखने की आवश्यकता है कि पूर्व में भी 50 सीट की क्षमता वाली बस में वास्तविकता में 47 सीटों का ही उपयोग परिवहन विभाग के आदेशानुसार संभव हो पाता था। क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से तीन सीटे हटा दी गई थी। लेकिन टैक्स तब भी 50 सीटों का ही लिया जाता था। मुझे यह व्यक्तिगत जानकारी है, जो कि, अभिलेख पर भी है कि, बैतूल में लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों को अपने गृहनगर भेजते समय 50 सीटों की बसों में 63 श्रमिक भेजे गये थे।

जिस प्रकार हवाई जहाज में केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ने बीच की सीट पर बैठना जारी रखा था, वैसे ही सुविधा बस में भी देनी होगी। सोशल डिस्टेसिंग का पालन श्रमिक टेªनों में नहीं हो पाया था। तब फिर उन आम नागरिकों को जो, इन बसों के द्वारा परिवहन करते है उन पर सीटों का प्रतिबंध लगाकर उनकी खास नई विशिष्ट श्रेणी एयर यात्रियों की तुलना में (उन्हे सामान्य बनाकर) क्यांे बनाई जा रही है?

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बीच की सीट छोड़ने के बाद भी 6 फीट का सोशन डिस्टेसिंग तो मेंटन नहीं हो पा रहा है? तब फिर ऐसे प्रतिबंध लगाने का आचित्य क्या है? बैतूल बस ऑपरेटरों ने इस संबंध में कलेक्टर बैतूल को एक ज्ञापन भी दिया है जिसके द्वारा उन्होंने अपनी मांग रखी है। मुझे यह बतलाया गया है कि प्रदेश स्तर पर मध्यप्रदेश बस ऑपरेटर संघ ने 1 जून को मध्यप्रदेश शासन के समक्ष अपनी मांगे रखी है। लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक उस पर कोई निर्णय शासन ने नहीं लिया है।

शायद “रोड पर लाने का कार्य” अच्छा नहीं माना जाता है इसलिए “लोकप्रिय शासन” रोड पर चल रहे लोगों को घर भेजने का कार्य को ज्यादा प्राथमिकता देता है। प्रदेश शासन से यह अनुरोध है की “भुगतती हुई” आम जनता के हित में कुछ न कुछ निर्णय अतिशीघ्र ले, ताकि एक संभ्रांत, निरीह, उपभोक्ता कोरोना काल मैं आए संकटों में कुछ कमी होकर राहत महसूस कर सके और तदनुसार उसके घावों की मरहम पट्टी भी हो जाएl

राजीव खंडेलवाल
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार )
Email :- [email protected]
Blog:- www.aandolan.com

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