निरर्थक साबित क्यों हो रहे कोरोना से बचाव के जतन?

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प्रधान संपादक,
मोहन लाल मोदी की कलम से

हम कोरोना की रोकथाम को लेकर जितने जतन कर रहे हैं, ऐसा लगता है सब निरर्थक साबित होते चले जा रहे हैं। बल्कि हो ये रहा है कि ज्यों ज्यों इस मर्ज की दवा की जा रही है, ये बढ़ता ही जा रहा है। पहली बार जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता कफ्र्यू लगाया था, तब सब कुछ एक खेल सा लग रहा था। जब लॉक डाऊन के दौरान कोरोना वॉरियर्स के लिए तालियां और थालियां बजाईं, तब भी किसी के माथे पर शिकन नहीं थी।

इसी उत्साह में दीपकों को रोशन करने का उद्यम भी बीत गया। दुनिया भर में तारीफ की जा रही थी कि भारत ने कोरोना से बचाव के लिए जो रास्ता चुना है, वह समय पर उठाया गया सर्वाधिक सुरक्षित कदम है। इस उत्साह जनक वातावरण से लग रहा था कि हम सहज भाव से इस महामारी को मात देने में कामयाब हो जाएंगे। लेकिन जैसे ही दूसरा और तीसरा लॉकडाऊन अस्तित्व में आते चले गए, ये बीमारी किसी अमरबेल की तरह ही बढ़ती चली जा रही है अब ये हालत है कि संक्रमण के मामले में हम धीरे धीरे एक लाख के आंकड़ के नजदीक पहुंचते जा रहे हैं।

जब इतने सारे संक्रमित बढ़ेंगे तो जाहिर है इस संक्रमण से होने वाली मौतें भी बढऩे वाली हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, जबकि हमारी शुरूआत तो बेहतर थी। जहां तक मध्य प्रदेश की बात है तो यहां पर भी इंदौर भोपाल और उज्जैन में लगातार बढ़ रहे संक्रमण ने सभी की सांसें फुला रखी हैं। नतीजा साफ है, आम आदमी की चिंताएं बढऩी शुरू हो चली हैं। सरकार और जिला प्रशासन के अधिकारियों को यह बात समझना चाहिए।

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यदि भोपाल की ही बात करें तो यहां के कुछ इलाके आम आदमी के लिए दहशत के केंद्र बन चले हैं। जहांगीराबाद और मंगलवारा जैसे संवेदनशील इलाकों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता देखने को मिल रही है। हालांकि ये सतर्कता सुरक्षा की दृष्टि से बहुत अच्छी है। अब लोग इन जैसे इलाकों में आने जाने से परहेज तो बरत ही रहे हैं, साथ में उन लोगों से भी दूरियां बनाने लगे हैं जो इन क्षेत्रों से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखते हैं।

देर से ही सही, लोगों की समझ में अब जो बात आ रही है, वो महामारी की चेन को तोडऩे की संभावनाएं जगाती है। देश भर के नागरिकों से भी यही उम्मीद है कि वे ऐसे क्षेत्रों से परहेज बनाए रखें, जहां से बीमारी आ सकती है। उनसे भी ज्यादा सावधानी ऐसे क्षेत्र के लोगों को बरतने की जरूरत है जो नाजुक हालातों के चलते पूरी तरह से प्रतिबंधित किए जा चुके हैं। देखने और सुनने में आ रहा है कि बेहद खतरनाक हो चले उक्त इलाकों में रहने वाले कुछ लोग अभी भी मामले को हलके में ही ले रहे हैं।

रास्ते सील हो जाने पर अब तंग गलियों को आवागमन और मेल मिलाप का जरिया बनाया जा रहा है। जबकि सबसे ज्यादा और सबसे पहले वहां के रहिवासियों को ही यह सोचने की जरूरत है कि कोरोना की हमसे ही क्या दुश्मनी है। यह संक्रमण के लिहाज से हमें ही सबसे ज्यादा प्रभावित क्यों कर रहा है। उन्हें अपनी गतिविधियों पर भी विचार और चिंतन मनन करने की जरूरत है। सोचना चाहिए कि हमसे कौनसी चूक हो रही है,समझ में आ जाने पर उस गलती को समय रहते सुधारा जाए। प्रयास किए जाने चाहिए कि आपसी दूरियों का पालन कुछ और बेहतर हो सकता है क्या।

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एक पहलू इस विसंगति का ये भी सामने आया है कि महामारी के निशाने पर अब वे रिहायशी इलाके हैं जो आबादी केे लिहाज से घने हैं। इनके सार्वजनिक रास्ते तंग गलियों से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। एक घर में कहीं कहीं तो दर्जनों परिजन एक साथ जीवन यापन कर रहे हैं। यदि व्यवहारिक नजरिये से देखा जाए तो यह एक मजबूरी है, गुनाह नहीं। लेकिन हम जैसे हैं और जिस हाल में भी हैं, आखिर तो हमें समस्या का समाधान इन्ही वर्तमान परिस्थितियों में ही तलाशने हैं।

मसलन – सरकार और प्रशासन ने ऐसे बेबस लोगों की सुविधा के लिए क्वारंटीन सेंटर अब घरों से इतर रिहायशी इलाकों के बाहर स्थापित कर दिए हैं। जाहिर है स्वास्थ्य विभाग पुलिस विभाग और प्रशासनिक अमला ये चाहेगा कि जिन लोगों के आवास और रिहायशी इलाके तंग हैं, उन्हें तयशुदा स्थानों पर ही क्वारंटीन किया जाए। इसी के साथ स्थानीय वाशिंदों को भी सकारात्मक व्यवहार अपनाने जरूरत है। क्यों कि यह सब उन्हीं की भलाई केे लिए किया जा रहा है।

इसके दो फायदे हैं, एक तो आप दीगर लोगों से संक्रमित होने से महफूज हो जाएंगे। दूसरा फायदा ये है कि यदि आप संक्रमित हुए तो आपके संपर्क में आकर आपका ही कोई अपना संक्रमित होने से बच जाएगा। नागरिक प्रतिबंधित क्षेत्र के हों या फिर संक्रमण रहित इलाके के, सभी को अपनी सलामती के लिए मेल मिलाप फिलहाल तो स्थगित ही कर देना चाहिए। क्यों कि संक्रमण से बचने का एकमात्र यही रास्ता अस्तित्व में है। दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक यह स्पष्ट कर चुके हैं कि कोरोना का इलाज उससे बचाव करके ही संभव है।

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बचाव ये है कि केवल रियायशी मौहल्लों में ही नहीं, बल्कि जरूरत महसूस होने पर पारिवारिक सदस्यों के बीच भी आदर्श दूरी बना कर गुजर बसर कर लेनी चाहिए। इसके मायने साफ हैं – कोरोना का इलाज चिकित्सकों से ज्यादा हमारे हाथ में है। यदि हम फिजिकल डिस्टेंसिंग यानि कि शारीरिक दूरियों को कायम रख पाएंगे तो चिकित्सक की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। वर्ना सरकार बचाव के नए नए रास्ते निकालती चली भी जाए तो होना जाना क्या है।

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