पुलिस एनकाउंटर में यूपी के गैंगस्टर की मौत

0
पुलिस एनकाउंटर में यूपी के गैंगस्टर की मौत

कानपुर शूट आउट का आरोपी था विकास दुबे

8 पुलिसकर्मी नहीं मरते तो क्या विकास मारा जाता?

पुलिस एनकाउंटर में यूपी के गैंगस्टर की मौत हो गई है। उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने जिसे मारा है, वह कानपुर शूट आउट का आरोपी था विकास दुबे । इस तथा कथित मुठभेड़ के बाद एक सवाल सभी के मन में है, वो ये कि यदि विकास के हाथों 8 पुलिसकर्मी नहीं मरते तो क्या विकास मारा जाता? ऐसे ही अनेक सवालो के जवाब तलाशने का सशक्त प्रयास है यह विचारोत्तेजक और अन्वेषक लेख

प्रधान संपादक
मोहन लाल मोदी की कलम से
आम नारिकों के साथ साथ अब पुलिस के लिए भी आतंक का पर्याय बन गया विकास पुलिस एनकाउंटर में गोली से मारा गया। जीतेजी विवाद का बिषय बना रहा विकास मरने के बाद भी विवादास्पद बना हुआ है। जीतेजी विवाद इस बात पर था कि विकास इतना बड़ा गैंगस्टर बना कैसे। तब इसमें उत्तर प्रदेश के अधिकांश नेताओं के संरक्षण की बात सामने आई। इसके बाद विवाद इस बात पर रहा कि विकास के लिए सबसे ज्यादा मददगार कौन नेता साबित हुआ। इन सब सवालों ये तीर हमाने जन नायकों की धवल छवि को लहुलुहान करते, इससे पहले ही विकास मौत का शिकार हो गया।

सबसे पहले बात आती है पुलिस वालों की। ये पुलिस ही है जो विकास दुबे जैसे दुर्दांत हत्यारों को जन्म देती है। वो पुलिस ही है जो सडक़ छाप बदमाशों की मददगार बनकर उसे बड़ा गैंगस्टर बना देती है। यदि बदमाश गली का गुंडा, सटोरिया, जुआरी अथवा अतिक्रमणकारी बनते ही ठीक किए जाते रहें तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि वो विकास बन ही नहीं सकते। ये काम अकेली पुलिस ही करती है, ऐसा कहा जाना पुलिस के साथ ज्यादती होगी। गली मुहल्लों के टटपूंजिए उठाईगीरों को फलक पर बिठाने में नेताओं की भूमिका भी कुछ कम नकारात्मक नहीं है।

शब्दघोष के फेसबुक पेज से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

कानपुर शूट आउट आरोपी

नेताओं की मेहरबानी के चलते पनपते हैं टपोरी

अपवाद स्वरूप जहां कहीं पुलिस बदमाशों पर सख्ती करना भी चाहती है तो उसे छुड़ाने नेताओं के फोन आ जाते हैं। इस प्रकार कभी पुलिस की तो कभी नेता की महरबाने के चलते ही छटभैये टपोरियों का तेजी से विकास होता चला जाता है। आज विकास का अंत हुआ, इस बात का शायद ही किसी को अफसोस हो। लेकिन इस बात का मलाल जिम्मेदार नागरिकों को हमेशा रहेगा कि एक गुंडे के साथ उसके हमराजों का खुलासा भी असंभव सा हो गया। यहां जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो प्रबुद्ध वर्ग के मन की बात है।

जैसे- विकास सही सलामत बना रहता तो वो ये राज जरूर खोलता कि उसे किस किस नेता और पुलिस वाले ने अपना हिस्से की सेवा लेकर गैंगस्टर बनाया। वो ये भी बताता कि जब पुलिस उसके गांव पर छापा मारने जा रही थी, तब उसे पुलिस महकमे के किस भेदिये ने फोन करके बताया कि विकास तुम मरने वाले हो। जिसके बाद पूरे 8 पुलिसवाले बे मौत मार दिए गए। दावे के साथ लिखा जा सकता है कि पुलिस जब थर्ड डिग्री अपनाती तो वो ये भी उगलता कि उसे उसके गांव से उज्जैन तक पहुंचाने में कौन कौन सहाय हुआ।

कैसे वो निश्चिंत होकर अपने पड़ौस के गांव में, फरीदाबाद में, और फिर उज्जैन के महाकाल परिसर में घूमता रहा। ये सवाल भी अनुत्तरि ही रह गया कि किसकी कृपा से बेहद सहज भाव से विकास मध्य प्रदेश में गिरफ्तार भी हो गया। अब पुलिस के पास केवल विकास के मृत्यु पूर्व बयान हैं जो उसने उज्जैन पुलिस को दिए। बल्कि ये बयान न होकर उन सवालों के वे जवाब हैं जो पुलिस पूछना और सुनना चाहती थी। नतीजतन ये खुलासा तो हुआ, या किया गया कि विकास ने ही कानपुर में 8 पुलिस वालों को मारा अथवा मरवाया।

हवाई मार्ग की जगह सड़क मार्ग क्यों ?

लेकिन यह बात राज बनकर ही रह गई कि एक दुर्दांत बदमाश की विकास यात्रा में किस किस की खादी और खाकी काम आई। ये सवाल जितने खतरनाक हैं, जवाब इनसे भी ज्यादा भयानक मिलने वाले थे। शायद तभी ये सवाल बीती शाम से दिमाग में कौंधने लगा था कि जिस विकास को हवाई मार्ग से उत्तर प्रदेश ले जाए जाने की बात चल रही थी, उसे सडक़ मार्ग से क्यों ले जाया गया। ये काम रात में ही क्यों उचित लगा? क्या कस्टडी पाने के दूसरे दिन सुबह के उजाले में उसे मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश नही ले जाया जा सकता था?

ये वो सवाल हैं जो सामने आने के साथ ही इन आशंकाओं को आकार देने लग गए थे कि अब विकास को भगवान भी मालिक नहीं रह गया है। हुआ भी वही जैसी आशंका थी, अल सुबह खबर मिली कि विकास मारा गया। यहां एक सवाल और- यदि विकास के हाथों पुलिस का एक उच्च अधिकारी, तीन मैदानी अधिकारी और चार सिपाही न मारे जाते, तो क्या तब भी विकास की तलाश में पुलिस जमीन आसमान एक कर रही होती? उसके अभेद्य किलेनुमा ठिकाने, बेशकीमती वाहन जेसीबी तले रोंदे जाते? उत्तर प्रदेश एसटीएफ की वो कार पलटती, जिसमें विकास बैठा हुआ था?

Click Here – To Follow Us On Twitter

विकास दुबे की मौत ,  गैंगस्टर की मौत

क्या तब भी विकास के फरार होने के प्रयास की कहानी सामने आती? क्या तब भी पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ विकास को मार दिया जाना घटित होता? बेहद खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि अभी तक के अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि यदि विकास ने 8 पुलिस वाले नही मारे होते तो ऐसा कुछ भी न हुआ होता। अभी भी विकास हमारे सिस्टम में कोढ़ बन कर बैठे भ्रष्ट खादीधारियों और खाकीधारियों के वरदहस्त तले अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बना रहता।

आइये …. अब जानते हैं पूरी घटना का वृतांत

अब जानते हैं कि उत्तर प्रदेश, एनसीआर, राजस्थान और मध्य प्रदेश की पुलिस को नाकों चने चबाने को मजबूर कर देने वाला दुर्दांत बदमाश किस सहज भाव से मौत को प्राप्त हो गया- डीएसपी देवेंद्र मिश्रा सहित 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे को कानपुर ला रही एसटीएफ टीम की गाड़ी पलट गई। ऐसे में ही विकास दुबे ने पुलिसकर्मियों से हथियार छीनकर भागने की कोशिश की और वह मुठभेड़ में मारा गया। यह सब इलिए हुआ, क्यों कि बीती 2 जुलाई को पुलिस विकास दुबे को पकडऩे पहुंची थी।

पुलिस से ही मुखबिरी मिलने पर उसने जेसीबी से रास्ते को घेर दिया और आठ पुलिस वालों की हत्या कर दी। इस बारदात के बाद विकास पड़ौस के एक गांव में पहुंचा और एक दिन वहां छुपा रहा। इसके बाद वो फरीदा बाद के होटल में दिखाई दिया। लेकिन पुलिस के पहुंचल से पहले चैकाऊट कर गया। वहां से एक गेरूआ रंगी की कार से ये उज्जैन पहुंचा। इस कार पर उ.प्र. उच्च न्यायालय लिखा हुआ था। 9 जुलाई को सुबह लगभग 9 बजे उज्जैन के महाकाल मंदिर पहुंचा था। वहां केशव नाम के दुकानदार से फल और पूजन सामग्री ली।

पुलिस एनकाउंटर

गार्ड ने विकास को पुलिस के हाथ सौंपा

उसी से वीआईपी पर्ची के बारे में जानकारी मांगी। केशव को शक हुआ तो उसने मंदिर में तैनात सिक्योरिटी गार्ड राहुल को जानकारी दी। गार्ड को संदेह हुआ तो उसने महाकाल थाना पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची तो गार्ड ने विकास को पुलिस के हाथ सौंप दिया। जब पुलिस उसे गाड़ी में बैठाने लगी तभी वह जोर से चिल्लाया कि मैं विकास दुबे हूं कानपुर वाला। उज्जैन कोर्ट में पेश कर देर शाम विकास यूपी एसटीएफ की टीम को सौंप दिया गया। अंधेरा होते होते यह टीम उसे सडक़ मार्ग से लेकर कानपुर के लिए रवाना हो गई।

अल सुबह खबर मिली कि एसटीएफ की वह कार जिसमें विकास बैठा था, वह पलट गई। मौके का फायदा उठा कर विकास ने भागने की कोशिश की। उसने घायल हुए एक जवान का तमंचा लेकर टीम पर फायर भी किए। जवाब में एसटीएफ टीम ने भी फायर किए। इसमें विकास को तीन गोलियां लगीं। एक गोली सीने पर लगने से संभवत: उसके प्राण निकल गए। पुलिस के मुताबिक मुठभेड़ में तीन पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इनके नाम अनूप कुमार, पंकज और प्रदीप बताए जा रहे हैं।

सर्वाधिक पढ़ी गयीं खबरें व आलेख

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here