कोविड-19 से लड़ाई में डॉक्टर्स की निष्ठाओं पर सवालिया निशान

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कोविड-19 से लड़ाई में डॉक्टर्स की निष्ठाओं पर सवालिया निशान

अद्वितीय कोरोना योद्धा के पिता को भी इलाज मिलने में परेशानी आई

बीते रोज जानकारी मे आई एक खेदजनक घटना ने कोविड-19 से लड़ाई में डॉक्टर्स की निष्ठाओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। आम आदमी तो अस्पतालों में व्याप्त अव्यवस्थाओं से परेशान है ही, एक मानसेवी कोरोना योद्धा के पिता को भी इलाज मिलने में परेशानी आ गई है। इससे सहज भरोसा हो जाता है कि कोविड-19 के इलाज को लेकर जो बेपरवाही की खबरें सामने आ रही हैं, वे पूरी तरह से अफवाहें तो कतई नहीं हैं।

प्रधान संपादक मोहन लाल मोदी की कलम से
हम बात मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की कर रहे हैं। यहां के सरकारी और प्रायवेट अस्पतालों में एक अद्वितीय कोरोना योद्धा के पिता को जगह नहीं मिली। अद्वितीय इसलिए, क्योंकि वह बगैर किसी प्रकार का लाभ लिए आम आदमी को कोरोना से बचाने का काम कर रहा है। इस बारे में विस्तार से जानना आवश्यक है। इससे आप सभी को यह जानने में आसानी रहेगी कि एक व्यक्ति को अद्वितीय कोरोना योद्धा क्यों कहा जा रहा है।

यह तो हम सभी जानते हैं कि भारत सरकार और भारतीया मानव समाज ने इस संक्रमण काल में चिकित्सा, पुलिस, सफाई आदि वर्ग के लोगों को कोरोना योद्धा का खिताब दिया है। हालांकि इन सभी को भारतीया खजाने से वेतन भत्तों के रूप में पर्याप्त धनराशि प्राप्त हो रही है। लेकिन हम जिस करोना योद्धा की बात कर रहे हैं, वो वाकई अद्वितीय है। क्योंकि वो सरकार से कोई आर्थिक इमदाद नहीें लेता।

उल्टे अपनी बचत राशि को खर्च करके आम आदमी की यथा संभव कोरोना से रक्षा कर रहा है। बता दें कि भोपाल के टीला जमालपुरा निवासी विजय अय्यर अपने पैसों से कैमिकल खरीद कर शहर को सैनेटाइज करने का कार्य हाथ में लिए हुए हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी साल भर की कमाई भी शहरवासियों के सलामती पर खर्च कर दी है। उनकी दिनचर्या तय है, सुबह नहा धोकर और खाना खाकर शहर में निकल जाना।

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उनके कंधे पर एक प्रेशर मशीन होती है। उसमें भरी दवा से वे लोगों की दुकानें, मकान, ठेले, एटीएम मशीन, वाहन, आदि सैनेटाइज करते फिरते रहते हैं। खास बात ये है कि वे इस कार्य के एवज में किसी से भी कोई पैसा नहीं लेते। इस महती कार्य को वे अपना कर्तव्य मानकर कर रहे हैं। बीते रोज इन्ही के पिता को सांस लेने में तकलीफ हुई तो ये भारी परेशानी में पड़ गए।

पूरे पांच घंटों तक जेपी अस्पताल, हमीदिया और विभिन्न प्रायवेट अस्पतालों के चक्कर काटते रहे। लेकिन इनके पिता को इलाज मिलना तो दूर रहा, उन्हें भर्ती तक करना मुनासिब नहीं समझा गया। आखिर कुछ रूतबेदार प्रशासनिक अधिकारियों का सहारा लेना पड़ गया। तब कहीं जाकर इस अद्वितीय कोरोना योद्धा के पिता को इलाज नसीब हो पाया।

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यहां सवाल ये है कि जिन लोगों के सम्मान में देश के प्रधान मंत्री ने थालियां और तालियां बजवाईं, शंख और घडिय़ाल तक बजवा दिए, वे संवेदनशून्य ही बने रहे? विजय जैसे सेवाभावी विशिष्ट कोरोना योद्धा के पिता की सेवा करने में ये चिकित्सक वर्ग खुद को थका हुआ महसूस कर रहा है। तो फिर आम आदमी क्यों उम्मीद करे कि उसके बीमार होने पर ये तथाकथित कोरोना योद्धा उसकी सेवा सुश्रुषा कर पाएंगे? आए दिन खबरे मिल रही हैं कि कोरोना के लिए निर्धारित वार्डों में मरीजों के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जारहा है।

टेस्ट रिपोर्टों में भी जमकर लापरवाही बरती जा रही है। एक प्रकार से पूरा का पूरा विभाग टारगेट पूरा करने में जुटा हुआ है। कोरोना योद्धा की जो पदवी चिकित्सकों को बड़े हर्षोल्लास और सम्मान के साथ सरकार और मानव समाज द्वारा अदा की गई थी, उसपर भी सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। जाहिर है ऐसे समय में जब देश और समाज को चिकित्सकों की आपात सेवा अनिवार्य हो चली है, तब चिकित्सकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझने की जरूरत है।

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