गुना के दलित मामले के सियासी मायने भी तलाशे जाएं

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गुना के दलित मामले के सियासी मायने भी तलाशे जाएं

ये बखेड़ा उप चुनावों से ठीक पहले ही क्यों खड़ा हुआ?

जरूरत महसूस की जाने लगी है कि देश भर में ख्याति पा चुके गुना के दलित मामले के सियासी मायने भी तलाशे जाएं। यदि जांच का आधार यह रहे कि ये बखेड़ा उप चुनावों से ठीक पहले ही क्यों खड़ा हुआ? तो मामले की सच्चाई तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। आखिर ऐसा क्या हुआ जो अचानक पूरा पुलिस प्रशासन दलबल सहित अचानक एक विवादित जमीन पर जा पहुंचा। केवल पहुंचा ही नहीं, सरकार के लिए असहनीय परेशानियां खड़ी करके अपनी खोह में जा छुपा।

प्रधान संपादक मोहन लाल मोदी की कलम से
दलित परिवार पर अत्याचार को लेकर मध्य प्रदेश का गुना जिला देशभर में ख्याति पा चुका है। ज्ञात ही है कि यहां पर पुलिस प्रशासन की टीम ने एक विवादित जमीन से दलित परिवार को बेदखल करने का बेहद आक्रामक रवैया अपनाया। नतीजतन जमीन पर काबिज पति पत्नी ने जहर पी लिया, अब अस्पताल में इलाजरत हैं। सरकार ने तत्परता के साथ एक के बाद एक कदम उठाकर मामले को नियंत्रित करने के ईमानदार प्रयास किए हैं। लेकिन अपेक्षानुरूप कांग्रेस के सियासी हमले जारी हैं। यह भी साफ है कि अब ये हमले रोके नहीं जाने हैं।

संभव है ये तब तक जारी रहें, जब तक कि मध्य प्रदेश की पच्चीस सीटों पर उप चुनाव सम्पन्न नहीं हो जाते। वर्ना ऐन वक्त पर इतने बड़े बखेड़ के खड़े होने का मतलब ही क्या रह जाएगा! इसी रणनीति के तहत बीते रोज कांग्रेस की जानी मानी नेत्री विभा पटेल का गुना दौरा हो चुका है। उन्होंने बतौर सहायता दलित परिवार के हाथ पर डेढ़ लाख रूपए रख कर ये संकेत दे दिए हैं कि कांग्रेस का हाथ अब इस विवाद के साथ है। कमल नाथ से लेकर राहुल गांधी तक, सब के सब गुना की घटना को ढाल बना कर सरकार को दलित विरोधी साबित करने में जुट गए हैं।

सरकार और पुलिस प्रशासन का ध्यान कानून व्यवस्था के स्थापत्य पर केंद्रित है। साथ ही ये पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है गुना जिला मुख्यालय पर इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ कैसे? अब चूंकि न्यायिक जांच की घोषणा हो गई है तो लोग दबी जुबान से शंकाएं व्यक्त करते देखे जाने लगे हैं। मसलन, दावा ये किया जा रहा है कि इस मामले के तार सीधे सीधे उप चुनावों की उठापटक से जुड़े हुए हैं। अत: ये जानना आवश्यक है कि जमीन का कथित कब्जाधारी और बटाईदार तो मोहरे मात्र हैं। इन्हें तो पता ही नहीं होगा कि इनके कंधे पर सियासी बंदूकें रखकर चुनावी निशाने साधे जा चुके हैं।

अत: ये खुलासा होना जरूरी हो चला है कि वे हाथ कौनसे हैं, जो गुना जिले की घटना को ढाल बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने की चाह रखते हैं। इनमें सबसे पहला वो नाम सामने आ रहा है जो बमोरी विधान सभा क्षेत्र में लगातार सियासी हार का शिकार है। जब सत्ता पक्ष का चुनाव चिन्ह भी नैया पार न लगा पाया तो अब विपक्षी हाथ थामने की महत्वाकांक्षा ने पाला बदलने को मजबूर किया है। इन्हें आतंकवादी को साहब कहने वाले विरोधी पक्ष के कद्दावर नेता का आशीर्वाद मिल चुका है।

आशंका जताई जा रही है कि इन्हीं कद्दावर नेता की शह पर समाजवाद के ये पैरोकार एक सजातीय प्रशासनिक अधिकारी की अदूरदर्शिता का लाभ उठा कर अपनी करतूतों को अंजाम देने में कामयाब हो गए। जांच में यह मामला भी शामिल किया जा सकता है कि विवाद का अखाड़ा बना दी गई जमीन पर कॉलेज निर्माण का ठेका किस फर्म अथवा व्यक्ति के पास है। फिर यह भी पता लगाया जाए कि इस निर्माण प्रक्रिया से जुड़े लोगों के तार किन किन लोगों से जाकर मिलते हैं।

हो सकता है कि सरकार उस बिंदु तक पहुंच जाए, जो अभी तक पुलिस और प्रशासन के हाथ से छूटा ही रह गया। सबसे बड़ी बात ये कि जिस जमीन को लेकर सरकार की छवि बिगाडऩे के प्रयास हुए, वो उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ में विवादित है। प्रकरण क्रमांक डब्ल्यूपी 17949-2019 पर दर्ज इस मामले को लेकर शासन को नोटिस जारी हो चुके हैं। अत: ऐसे में न तो वहां फसल बोई जा सकती थी और न ही निर्माण ही शुरू किया जा सकता था।

लेकिन इसके बाद भी एक ओर से निर्माण शुरू कराने जमीन खाली कराने की आवाजें बुलंद की जाती रहीं। वहां पर फसल की बुवाई हो गई और बुवाई पर अच्छा खासा बखेड़ा भी खड़ा हो गया। आयएएस अथवा आयपीएस अधिकारी इस हद दर्जे की लापरवाही कर सकते हैं, यह सोचा भी कैसे जा सकता है? अत: आशंकाएं यही व्यक्त की जा रही हैं कि जो कुछ भी हुआ, वो एक सोची समझी साजिशों की एक कड़ी मात्र है। अभी उप चुनाव दूर हैं, सरकार को बेहद सतर्कता का परिचय देना होगा।

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