गुना मामले में मीडिया धन्यवाद का पात्र

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गुना के दलित मामले के सियासी मायने भी तलाशे जाएं

सोची समझी साजिश के तहत सरकार की छवि बिगाड़ने का बड़ा षडय़ंत्र

आज जिस घटना को लेकर प्रदेश भर की राजनीति गर्माई हुई है, उस गुना मामले में मीडिया धन्यवाद का पात्र माना जाना चाहिए। क्यों कि खबरें ये मिल रही हैं कि मौके पर पत्रकार न होते तो बड़ी मुसीबत में फंसती सरकार। यदि कथित साजिशों का खुलासा चाहिए तो फिर इस मामले को उच्च स्तरीय जांच की दरकार है। बताया ये जा रहा है कि ये सब सोची समझी साजिश के तहत सरकार की छवि बिगाड़ने का बड़ा षडय़ंत्र था। यह कृत्य भावी उप चुनावों के मद्देनजर रचा गया प्रतीत होता है।

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प्रधान संपादक मोहन लाल मोदी की कलम से
भोपाल। जिस ग्वालियर चंबल संभाग में सबसे ज्यादा सीटों पर उप चुनाव होना है, उसी घमासान वाले क्षेत्र में बीते रोज एक घटना ने सियासी पारे को एकदम गर्मी प्रदान कर दी। संक्षिप्त में बता दें कि पुलिस प्रशासन की टीम ने अतिक्रमण हटाने के नाम पर दलित दंपत्ति को जमकर मारा, पीटा, घसीटा और अपशब्द कहे। यहां तक कि कर्जा लेकर बोई गई फसल पर जेसीबी चलवाई गई। जब हाकिम बेदर्द हो गए तो पति पत्नी ने टपरे में रखा कीट नाशक गटक लिया। अब दोनों उपचाररत हैं। जबकि महिला की हालत गंभीर बताई जाती है।

देखने में ये मामला एकदम अतिक्रमण विरोधी मुहिम का लगता है। लेकिन इसके नजारों पर गौर करें तो संदेह पैदा हो जाता है कि पूरे मामले की स्क्रिप्ट मानो पहले से ही तय थी। यह सब उसी हिसाब से किया जा रहा था। ये बात संभवत: उस हद तक पहुंचनी थी, जो प्रदेश सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती थी। लेकिन मौके पर पत्रकारों और खासकर प्रेस के वीडियो जर्नलिस्ट्स की मौजूदगी ने संभावित स्क्रिप्ट पूरी नहीं होने दी। जैसे ही ये घटना सामने आई विभिन्न चेनलों पर पुलिस प्रशासन की बर्बरता आम हो गई।

प्रदेश भर की राजनीति

पत्रकार न होते तो बड़ी मुसीबत में फंसती सरकार

मामला तत्काल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा और सांसद ज्यातिरादित्य सिंधिया के संज्ञान में आ गया। नतीजा ये निकला कि सुबह होने से पहले ही जिले के कलेक्टर और एसपी को शंट कर दिया गया। इससे पीडि़त परिवार के साथ उस वर्ग को भी राहत महसूस हुई जिसे दलित कहा जाता है। अब जांच का बिषय ये है कि इस मुहिम के तहत एक दलित परिवार को जानवरों की तरह क्यों मारा पीटा और घसीटा गया। वह भी तब, जब ऐसा करने वाले देख रहे थे कि सामने पत्रकारों और प्रेस फोटोग्राफरों की टीम मौजूद थी।

वे जानते थे कि हम जो कुछ भी अवांछनीय कर रहे हैं, वह सब रिकॉर्ड हो रहा है। लेकिन अपनी नौकरी और दायित्वों की परवाह किए बगैर फिर भी वह सब किया गया, जो नहीं करना था। यही वो बात है जो सोचने को मजबूर करती है कि क्या ऐसा जानबूझ कर किया गया? ये इसलिए भी सोचना चाहिए, क्यों कि गुना जिला ग्वालियर चंबल संभाग का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यही वो क्षेत्र है, जहां पर सर्वाधिक सीटों पर विधान सभायी उप चुनाव होने हैं। ये चुनाव इतने महत्व पूर्ण हैं कि मध्य प्रदेश सरकार का भविष्य तय करने वाले हैं।

इसी रणभूमि का चुनाव परिणाम तय करेगा कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनी रहेगी अथवा यहां वापिस कांग्रेस का राज स्थापित होगा। यही वो वजह है जिसके चलते शिवराज सरकार ने अपनी कैबिनेट में इसी क्षेत्र से ज्यादा मंत्री लिए हैं। अधिकतम विकास योजनाओं की बरसात भी इन्ही इलाकों में की जा रही हैं। जाहिर है ऐसे में सत्ता पक्ष तो कतई नहीं चाहेगा कि ऐन चुनावी बयार के बीच कुछ ऐसा हो, जिससे कोई नया बखेड़ा पैदा हो। लेकिन खड़ा हो गया, बल्कि ये कहा जाना अतिश्योक्ति नही होगी कि खड़ा कर दिया गया।

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सरकार की छवि बिगाडऩे

मामले को उच्च स्तरीय जांच की दरकार

तो इसके मायने समझने योग्य हैं। ये पता लगाया जाना जरूरी है कि पुलिस ने अभी तक उस व्यक्ति को गिरफ्त में क्यों नहीं लिया, जिसने इस दलित दंपत्ति को वह जमीन बंटाई पर खेती करने दी थी, जिसे पुलिस प्रशासन सरकारी बता रहा है। जबकि पति पत्नी दोनों चीख चीख कर कहते रहे कि ये खेत हमने बंटाई पर लिए हैं और बुआई में लाखों रूपया कर्ज लेकर लगा चुके हैं। क्या पुलिस और प्रशासन के लिए ये जानना जरूरी नहीं था कि वो कौन है जिसने जमीन बंटाई पर दी और किस आधार पर दी। लेकिन ऐसा नहीे किया गया।

क्यों कि जो इस दलित दंपत्ति के साथ किया गया, यदि वो जमीन देने वाले के साथ किया जाता तो एक तो इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा नहीं होता। क्यों कि वह व्यक्ति एक जरायम पेशा जाति से सम्बन्धित बताया जाता है। यही वो कारण बताया जा रहा है जिसके चलते सोची समझी साजिश के तहत निशाना एक दलित परिवार को बनाया गया। ये भी बताया जाता है कि घटना स्थल पर यदि कैमरे नही चल रहे होते तो मामला और ज्यादा वीभत्स हो सकता था।

उसके बाद यदि बात मीडिया में जाती तो केवल प्रदेश में ही नहीं देश भर में बवाल खड़ा हो सकता था। इसका सीधा सीधा नुक्सान सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी को पहुंचना था। लेकिन बात घूमफिर कर वहीं पर आ जाती है कि पत्रकारों और प्रेस फोटो ग्राफरों ने मामले को तत्काल सार्वजनिक कर दिया। जिससे सरकार को कम जोखिम पर ही सख्त कदम उठाने की मोहलत मिल गई। इसी लिए इस लेख की शुरूआत में लिखा गया है कि गुना मामले में मीडिया धन्यवाद की पात्र है। सरकार को उसका कृतज्ञ होना चाहिए।

मुसीबत में फंसती सरकार

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