बलात्कार किया, आंखें फोड़ दीं और जीभ काटकर फेंक दी

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बलात्कार किया, आंखें फोड़ दीं और जीभ काटकर फेंक दी

हैवानों को सजा कब मिलेगी, यह कोई नहीं जानता

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में बदमाशों ने एक बालिका का सामूहिक बलात्कार किया, आंखें फोड़ दीं और जीभ काटकर फेंक दी। बेशक आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। लेकिन हैवानों को सजा कब मिलेगी, यह कोई नहीं जानता। ये अनिश्चितता आम आदमी की बेचैनी बढ़ाए हुए है। यदि इस माहौल को बदलने की इच्छा शक्ति बाकी है तो देशभर के सभी वर्गों को आगे कदम बढ़ान ही पड़ेगा।

प्रधान संपादक मोहनलाल मोदी की कलम से
स्वतंत्रता दिवस के एक दिन के अवकाश उपरांत जब अखबारों ने नियमित दस्तक दर्ज कराई तो सभी ओर ध्वजारोहण की खबरें प्रमुखता लिए हुए नजर आईं। इसी की साथ एक ऐसी खबर देखने को मिली, जिसने हमारी आजादी पर ही प्रश्र चिन्ह लगा दिए। वो खबर थी एक 13 साल की बालिका के साथ अमानुषिक कृत्य की। जी हां, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिला अंतर्गत पकारिया गांव में अमानुषों ने एक बालिका के साथ न केवल बलात्कार किया, बल्कि उसकी आंखें निकाल लीं और जीभ काट कर फेंक दी।

यदि इस दुष्कृत्य को अलग अलग करके भी देखा जाए तो भी हर ओर अमानुषिकता ही नजर आती है। पहली बात तो बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, ये अपने आप में अमानुुषिक कृत्य ही है। उस पर बालिका की आंखें फोड़ देना और उसकी जीभ काटकर फेंक देना तो अमानुषिक ही नहीं, पाश्विक कृत्य ही कहे जा सकते हैं। ये हमारी संवैधानिक व्यवस्थाओं की खामियां ही हैं, कि आरोपियों को भले ही पकड़ा जा चुका है, लेकिन मृत्यु पर्यंत इन्हें उस बालिका की तरह प्रताडि़त नहीं किया जा सकेगा।

यही वो वजह है कि जब कभी पुलिस ऐसे जानवरों का एनकाउंटर करती है तो आम आदमी को तात्कालिक राहत तो महसूस होती है। क्यों कि हमारे देश का कानून ही ऐसा है कि जब आरोपी अपना जुर्म कबूल कर लेता है तो पुलिस को उस पर ताकत इस्तेमाल करने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। फिर सारे अधिकार अदालत के दायरों तक सिमट कर रह जाते हैं। हालांकि वहां पर भी अंतत: अपराधियों को उनके सही अंजाम तक ही पहुंचाया जाता है।

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लेकिन कानूनी पेचीदगियों में इतना वक्त जाया होता रहता है कि फैसला आते आते काफी देर हो जाती है। अत: वह न्याय सही मायने में न्याय रह ही नहीं जाता। यही वजह है कि आसमाजिक तत्वों में कानून व्यवस्था के प्रति भय रह ही नहीं गया है। इन्हीं अव्यवस्थाओं से निराश होकर आम जनमानस अब ये कामना करने लगा है कि पुलिस इन हैवानों को कहीं एकांत में ले जाकर गोलियों से भून डाले तो ज्यादा अच्छा हो।

जब ऐसा होता है तो पीडि़त पक्ष और आम नागरिक खुशियां मनाता तथा पुलिस वालों को हीरो प्रतिपादित करने लगता है। कारण साफ है, उसे बेहद धीमी कानूनी प्रक्रिया पर सब्र करना असहनीय हो चला है। अत: इस बात की आवश्यकता है कि हमारे संविधान से उन धाराओं को खत्म कर देना चाहिए, जिनका सहारा लेकर सत्यापित अपराधी भी फांसी जैसी बेहद गंभीरतम सजा को भी टालने में सफलता पाते रहते हैं।

इसी के साथ आवश्यकता है पुलिस और समाज के बीच मैत्रीय भाव स्थापित करने की। अभी तक देखने में ये आता है कि पुलिस वालों के मधुर संबंध जितने सटोरियों, जुआरियों और अन्य माफियाओं से होते हैं, उतने जन सामान्य के साथ अनुकूल नहीं हो पाते हैं। यही वजह है कि फरियादी पक्ष यथा संभव पुलिस के पास जाने से सकपकाता है। वहीं असंवैधानिक कार्यों में संलग्र लोग उसके बगलगीर बने रहते हैं।

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ये तस्वीर आदतन बदमाशों के हौंसले तो बढ़ाती ही है, नए बदमाशों की तादाद बढ़ाने के लिए भी अनुकूल वातावरण मुहैया कराती है। इस माहौल को लेकर समाजिक परिवेश में बढ़ रही अनैतिकता को भी कतई नकारा नहीं जा सकता। इसी के साथ सरकार की इच्छा शक्ति पर भी सवालिया निशान उत्पन्न होते हैं। वो अभी तक स्वयंभू प्रबुद्ध वर्ग से डरकर कड़े कानून बनाने और उन्हें कड़ाई के साथ लागू करने पर दाएं बाएं होती रहती है।

उदाहरण के लिए-इंटरनेट पर परोसी जाने वाली अश्लीलता पर निर्णायक लगाम लगाने को लेकर ईमानदार प्रयास फिलहाल नदारद ही बने हुए हैं। दावे के साथ लिखा जा सकताा है कि मानव समाज में आज जितनी भी यौन अत्याचार की घटनाएं सामने आ रही हैं, इनमें से अधिकांश के मूल में इंटरनेट पर मौजूद अश्लीलता ही है। बाकी काम नशे के वैध और अवैध सामान बिगाड़ रहे हैं।

लिखने का आशय ये कि बालात्कार और बलात्कार बाद बालिकाओं, महिलाओं की हत्या, उनके शवों की दुर्गति किए जाने के मामले असहनीय हो चले हैं। इन्हें रोकना किसी वर्ग बिशेष के वश की बात नहीं रह गई है। इसके लिए समाज के हर एक वर्ग को आगे आना ही होगा। वर्ना बेटियों के मातापिता आशंकाओं के बीच जीने को विवश बने रहेंगे। ये माता पिता हम और आप भी हो सकते हैं।

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