दिग्गी राजा की असल दुश्मनी सिंधिया से

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Digvijay singh and Jyotiraditya Scindia

उनका रूतबा असहनीय, कांग्रेस भले ही डूब जाए

प्रधान संपादक,
मोहन लाल मोदी (Mohan Lal Modi) की कलम से

मध्य प्रदेश (madhya Pradesh ) के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (Digvijay singh) ने अपने बयानों से यह जाहिर कर दिया है कि उनकी असल दुश्मनी भाजपा (bjp) से नहीं, सिंधिया से है। तभी तो उन्होंने कांग्रेसजनों (Congress) के नाम जारी अपील में कहा है कि कांग्रेस (Congress) को खत्म करना है तो कर देना, उसके लिए हजार अवसर मिलेंगे। लेकिन पहले इन 22 को हराना जरूरी है। दिग्गीराजा के बयान को सुनकर प्रदेश के एक दिवंगत मुख्यमंत्री स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा (Sundar lal patwa) की पीड़ा स्मरण हो आई। जब उनकी ढाई साल की सरकार राम मंदिर आंदोलन के नाम पर कांग्रेस की तत्कालीन केंद्र सरकार (Central government) द्वारा ढहा दी गई, प्रदेश मे दुबारा चुनाव हुए तो भाजपा मतदान पेटियों बाहर ही नहीं निकल पार्ई।

तब जीत का श्रेय कांग्रेसी नेता अपने अपने नाम करने में उद्यमरत थे। उस वक्त पटवा जी ने कहा था कि इस चुनाव में कांग्रेस जीती ही नहीं, सही मायने में भाजपा अपने आप से हारी है। सत्ता से वंचित होने के बाद उन्होंने अपने पहले भाषण में कहा था कि लोगों को इस बात का गम नहीं रहा कि भैया (भाजपा) की जान चली गई। बल्कि खुशी इस बात की मनाई जा रही है कि भौजी (पटवा) की अकल ठिकाने आ गई। उनके कहने का आशय था कि कुछ लोगों को मुख्य मंत्री की कुर्सी पर मै रास नहीं आ रहा था तो नेता बदल लेते। लेकिन मुझे (भौजी) सबक सिखाने के लिए भैया (भाजपा) को ही ठिकाने लगा दिया, ये कहां की समझदारी रही? यदि पटवा जी की भावनाओं को समझें तो उनकी बातों का सार यही था कि तत्समय जो भी भाजपा नेता मुझसे विरोध रखते थे, वे पार्टी से कह कर नेता बदलवा लेते या मुझ से कह देते तो मै स्वयं ही दूर हो जाता।

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लेकिन पार्टी को किसी भी हालत में नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहिए था। आज कांग्रेस में लगभग वैसे ही हालात हैं। भौजी (कमलनाथ) की अक्ल ठिकाने लगाई जा चुकी है, भले ही इसके लिए भैया (कांग्रेस) की बलि क्यों न देनी पड़ गई हो। लेकिन नेताओं की मति विपरीत है। पर्दे के पीछे रहकर प्रदेश सरकार को ध्वस्त किया जा चुका है। अब कांग्रेस को मिटा देने की बात की जा रही है, वह भी इस कीमत पर कि कांग्रेस को मिटाना है तो मिटा देना, इसके लिए अनेक अवसर भी मिलेंगे। लेकिन ये 22 नहीं जीतना चाहिए। तो इसके लिए कांग्रेस को इस बात का मंथन अवश्य करना चाहिए कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की दुर्दशा और कांग्रेसनीत प्रदेश सरकार को गिराने अथवा गिरवाने के लिए असल दोषी कौन रहा। मसलन, मध्य प्रदेश का वह कौनसा एक मात्र नेता है जो किसी भी सूरत में ग्वालियर राजघराने को राजनीति में सरसब्ज देखना नहीं चाहता।

कांग्रेस को पता लगाना चाहिए, वो कौन है जो परदे के पीछे रहकर, अपने समर्थक घाघ नौकरशाहों की दम पर समानांतर सरकार चलाता रहा। कौन है वो कांग्रेसी नेता जिसने पहले मुख्यमंत्री पद पर फिर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर मनोनयन के वक्त सिंधिया की राह में कांटे बिछाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। कांग्रेस को क्या इस बात का पता नहीं चलना चाहिए कि किसने सरकारी क्रियाकलापों में दखल दे देकर हर वो परिस्थिति निर्मित कीं, जिससे कमलनाथ और सिंधिया के बीच मतभेद बढ़ते चले गए, जो अंतत: मनभेद की हद तक जा पहुंचे। इतने कि कांग्रस को सरकार के द्वार तक लाने में महती भूमिका निभाने वाले सिंधिया को कहना पड़ गया कि मुझे सडक़ पर उतरने को मजबूर मत करो और इधर नाथ ने भी कह दिया कि उतरना है तो वह भी करके देख लो।

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नतीजा सबके सामने है, भीतरघात करने की बजाय सिंधिया पार्टी ही छोड़ कर चले गए। साथ में 22 विधायकों ने सत्ता के आवरण को त्यागकर अपने नेता का अनुसरण करके निष्ठाएं असंदिग्ध कर दीं। अब वक्त है पार्टी को एक जुट करने का तो एक नेता होने के नाते दिग्गी राजा की सोच व्यापक होनी चाहिए। उन्हें ये संदेश देना था कि कांग्रेस बची रही तो बहुत सारे 22 आ जाएंगे, अत: हमें अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए उसकी रीति नीति को एक बार फिर युद्ध स्तर पर जन जन तक पहुंचाना चाहिए। लेकिन नही, उनका लक्ष्य तो सिंधिया के रूतबे हो धूल धुसरित करना है, न कि कांग्रेस को उत्थान की ओर ले जाना। इसीलिए उनके मुख से अक्सर ऐसी बातें निकलती रही हैं, जो बेशक सिंधिया समेत उनके अन्य विरोधियों के आभा मंडल को दूषित करने का असफल प्रयास करती प्रतीत होती हैं, लेकिन इससे कांग्रेस की भी थुक्का फजीहत होती रही है।

उदाहरण के लिए- एक सोची समझी रणनीति के तहत आज भी सरकार और कांग्रस के पतन के लिए सिंधिया को ही दोषी ठहराने के सुनियोजित प्रयास जारी हैं। ये व्यक्तिगत वैमनस्यता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? अब जो नेता आपकी पार्टी में रहा ही नहीं, उस व्यक्तित्व के बारे में, उसकी पीठ पीछे यह दोषारोपण का निंदनीय प्रयास कब उचित माना जाता रहेगा? जहां तक सिंधिया की बात है तो उनके समर्थकों का कहना हमेशा यही रहा कि हमारी अनदेखी हो रही है। हमारे द्वारा प्रस्तुत जनहितैषी कार्य रद्दी की टोकरियों में डाले जा रहे हैं। चेतावनियां तक दी गईं, हमारे धैर्य की परीक्षा मत लो। तब इन शाब्दिक जुगालियां करने वाले स्वयंभू कांग्रेसजन को क्या हो गया था।

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तब क्यों इन्होंने अपनी महानता का परिचय नहीं दिया और क्यों कांग्रेस को बचाने का प्रयास नहीं किया? कारण साफ है, सिंधिया सहन नहीं थे और न हो रहे थे। ये बात तत्कालीन मुख्यमत्री को देर से समझ में आईं। अंतत: उनका दर्द भी छलक ही पड़ा और प्रेस के सामने बेहद मर्यादित शब्दों में कह बैठे कि मै तो भरोसे में मारा गया। मुझे अंत तक यही बताया गया कि सिंधिया अकेले जाते हैं तो जाएं, उनके साथ एक भी विधायक नहीं जाने वाला। अब एक बार फिर कांगे्रस पर प्रहार की तैयारी उसके अपने घर से, उसके ही नेता द्वारा यह कह कर की गई है कि कांग्रेस को भले ही मिटा देना, लेकिन ये 22 नहीं जीतना चाहिए। क्या कांग्रेस को इस नासमझी पर संज्ञान नहीं लेना चाहिए, या अभी कुछ और बर्बादी देखना बाकी है?

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